संथाली लोक कथा गुणी बुढा| SANTHALI LOK KATHA GUNI BUDHA | santhali folk story

santhali folk story-Guni  Budha :एक गांव में एक एक वृद्ध दंपति रहते थे ।उन दोनों के कोई बाल-बच्चा नहीं था। उन लोगों के बीच खाने-पीने को लेकर अक्सर विवाद हुआ करता था । एक दिन की बात हैउसकी पत्नी ने पकवान बनाने का विचार किया। इसलिए चूल्हे-चौके की तैयारी करके वह बुढ़िया पकवान बनाने को बैठी। उधर वह बूढ़ा घर के पिछवाड़ में बैठा कोई चीज बनाने के बहाने कोई लकड़ी काटता-छांटता रहा। बुढ़िया जितनी बार कड़ाही में लोई डालती उतनी बार छन्न-सी आवाज हुआ करती और वह बूढ़ा जितनी बार छन्न-सी आवाज होती उतनी बार एक-एक गोटी अपने पास रखता जाता था। जब कड़ाही में लोई डालने की आवाज होना बंद हो गया तब उस बूढ़े ने अपने पास इकट्ठी सारी गोटियों को गिन डाला। कुल बाईस गोटियां हुईं। इस प्रकार, उस बूढ़े ने समझ लिया कि बाईस पकवान पकाए गए हैं।

पकवान बनने के बाद बुढ़िया ने अपने पति (उस बूढ़े) को खाने के लिए बुलाया और थाली में थोड़े-से पकवान ही परोसे। उस बूढ़े ने कहा, “तुमने तो कुल बाईस पकवान बनाए हैं; परंतु, मुझे ये थोड़े से ही दे रही हो ? बाकी पकवान क्या हुए ?”उस बुढ़िया ने चुपके से सारे पकवानों को गिना। सचमुच कुल बाईस पकवान थे। यह देखकर उस बुढ़िया को बहुत आश्चर्य हुआ। वह सोचने लगी-इस (बूढ़े) ने तो पकवान बनाते हुए मुझे देखा नहीं था, फिर भी यह कैसे जान गया कि मैंने कुल बाईस पकवान बनाए हैं? बुढ़िया को शक हुआ (बूढ़ा) कोई मंतर-तंतर जानता हो। और यह बात उसे बचाया नहीं जा सका और अपने आसपास की महिलाओं के बीच यह जानकारी दे दी अब क्या कानों कान गांव में यह फैल गया कि बूढ़ा बहुत  अगम जानी है, मन  की बात को जान जाता है ।

गुणी बुढा द्वारा बाघ को मारना-

कुछ समय बाद। बूढ़ा जिस राजा के राज में रहता था वहां के जंगल में एक बहुत खतरनाक बाघ आतंक मचा दिया था । वह बाघ आस-पास के लोगों की भेड़-बकरियां, मवेशी आदि उठाकर ले जाया करता और उन्हें मारकर खा जाया करता था। लोग उस बाघ के उपद्रव से तंग थे। इस पर राजा साहब ने उस बाघ को मरवाने के कई उपाय किए, परंतु, कोई उस बाघ को मार न सका। राजा साहब की चिंता बढ़ गई थी। वैसी स्थिति में कानों-कान राजा साहब को मालूम हुआ कि अमुक गांव में एक गुनी बूढ़ा (Guni  Budha) है जो उस बाघ को मार सकता है।

अतः, राजा साहब ने उस बूढ़े को बुला लाने के लिए अपने सिपाहियों को हुक्म दिया। तदनुसार, कुछ सिपाही ढूंढ़ते हुए उस बूढ़े के गांव में पहुंचे और उससे बोले, “हमारे राजा साहब के यहां तुम्हारा बुलावा है। तुम्हें मालूम ही होगा कि इस राज के जंगल में एक खतरनाक बाघ है जिसे मरवाना है; क्योंकि वह बाघ लोगों को बहुत तंग कर रहा है। राजा साहब ने कई उपाय उस बाघ को मरवाने के लिए किए, परंतु कोई उसे मार नहीं सका है। सुना गया है कि तुम एक गुनी आदमी हो, कई तरह के गुन-मंतर जानते हो। इसीलिए उस सिलसिले में राजा साहब ने तुम्हें उनके पास ले जाने के लिए हमें भेजा है। चलो मेरे साथ राय दरबार । न सिपाहियों की बात सुनकर डर के मारे उस बूढ़े की छाती धड़कने लगी। उसने सोचा-मैं तो कोई गुन-मंतर जानता नहीं हूं। अब तो बूढ़ा भी हो गया हूं। भला, उस मामले में कर ही क्या सकता हूं। अतः, वह बूढ़ा राजा साहब के यहां जाने में ना-नुकुर करने लगा; परंतु, राजा के सिपाही उसे छोड़नेवाले नहीं थे। वैसी हालत में उस बूढ़े को राज-दरबार जाने के लिए तैयार होना ही पड़ा।

राज-दरबार  पहुंचते-पहुंचते सांझ हो गई थी। अतः, राजा साहब का हुक्म हुआ कि उस बूढ़े को खिला-पिलाकर रात भर विश्राम करने दिया जाए। सबेरे इससे काम की बात की जाएगी। तदनुसार, उस बूढ़े को भोजन करवाकर एक घर में उसके सोने का इंतजाम कर दिया गया। वह बूढ़ा अपने साथ तीर-कमान और कुल्हाड़ी लेता गया था।

परंतु, जिस काम के सिलसिले में उस बूढ़े को बुलवाया गया था उसकी कल्पना मात्र से उसके प्राण कांप रहे थे। नींद उसे आए भी कहां से ! डरपोक तो वह था ही। मन-ही-मन उसने सोच लिया कि किसी तरह यहां से भाग जाना चाहिए। इसलिए रात हो जाने पर जब उसने लोगों को सोया हुआ देखा तब चुपके से उठा और अपना तीर-कमान और कुल्हाड़ी लिए हुए वहां से भाग चला।

भागते-भागते बूढ़ा एक घने जंगल में जा पहुंचा। उस दिन चांदनी रात थी। इसलिए जंगल की चीजें किसी तरह दिख जाया करती थीं। जंगल में वह बूढ़ा जहां जा पहुंचा था वहां बगल में एक नाला था। संयोग से उसी समय एक मोर उस बूढ़े के समीप से उड़कर उस नाले के उस पार चला गया। तभी वह बूढ़ा बोल पड़ा, “अरे, तुम उड़कर नाला टाप गए; नहीं तो मैं तुम्हारा साज-सिंगार कर देता !”

वह खतरनाक बाघ उस समय उसी नाले के किनारे झाड़ियों में छिपा बैठा था। उसके कानों में जब उस बूढ़े की वह बात पड़ी तब वह (बाघ) उस बूढ़े के समीप आया और उससे बोला, “तुम क्या क्या बोला फिर से बोलो ? बाघ को देखते ही डर से उस बूढ़े के प्राण जैसे उड़ गए ! फिर भी, उसने साहस करके कहा, “मेरे सामने से एक मोर उड़कर इस नाले के उस पार चला गया; उसी पर मैंने कहा कि अरे, तुम उड़कर नाला टाप गए, नहीं तो मैं तुम्हारा साज-सिंगार कर देता।”

बाघ ने कहा, “अच्छा, तुम उसका साज-सिंगार कर देते ! मेरा भी साज-सिंगार कर दो न। देखूं, तुम कैसे साज-सिंगार करते हो।”

उस बाघ की उस बात पर बेचारे बूढ़े का भय कुछ दूर हुआ। उसने पास के एक पेड़ की ओर इशारा करते हुए उस बाघ से कहा, “अच्छी बात है; तुम्हारा सिंगार मैं अच्छी तरह कर दूंगा। तुम इस पेड़ के पास बैठे रहो। मैं साज-सिंगार के सामान लिए आता हूं।” यह कहकर वह बूढ़ा अपनी कुल्हाड़ी लिए हुए उस नाले के किनारे से कुछ मजबूत लत्तर काट लाया और उस बाघ से बोला, “बाघ भाई, तुम जरा इस पेड़ से सटकर बैठ जाओ। मैं तुम्हारा साज-सिंगार कर दूं। देखना, तुम हिलना-डुलना नहीं; नहीं तो सारा साज-सिंगार बिगड़ जाएगा।”

कि वह बाघ चुपचाप उस पेड़ से सटकर बैठ गया। उस बूढ़े ने उस बाघ को उस पेड़ से सटाकर मजबूती से बांध दिया और देख लिया कि वह बाघ बंधन तो नहीं तुड़ा सकता है। इस प्रकार, पूरी तरह इत्मीनान होकर वह बूढ़ा अपनी कुल्हाड़ी से तब तक उस बाघ पर वार करता रहा जब तक वह बाघ मर न गया। करतब तक रात कुछ बाकी थी। बाघ के मर जाने पर उस बूढ़े ने सोचा, “जिस खतरे से मैं भागा जा रहा था वह खतरा तो अब टल गया। अब भागने से क्या फायदा ?” अतः, वह वहां से लौट गया और जिस घर में सोया हुआ था वहीं जाकर सो रहा।

सुबह उस बूढ़े को खिला-पिलाकर राज-दरबार में पेश किया गया। यहां राजा साहब ने  सुनाया, “हमारे राज में एक खतरनाक बाघ है। उसे मार डालने के लिए मुंह मांगे इनाम दिया जाएगा।  मैंने सुना है कि जो काम किसी से नहीं हो सकता है वह (काम) तुमसे हो जाता है। इसलिए हमें भरोसा है कि तुमसे उस बाघ को मार सकते हो इसीलिए यहां बुलाया गया है।”

वह बूढ़ा बोला, “राजा साहब, यह तो कोई कठिन काम नहीं है। उस बाघ को तो मैंने पिछली रात ही मार डाला है और उसे जंगल में एक पेड़ से बांध रखा है। उसे आप यहां मंगवाकर देख सकते हैं।”

इस पर राजा साहब और उनके दरबारी लोग बड़े अचंभित हुए। फिर, राजा साहब ने अपने सिपाहियों को उस बूढ़े के साथ भेजकर उस मरे हुए बाघ को जंगल से अपने यहां मंगवाया। उसे देखकर लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। राजा साहब ने उस बूढ़े को काफी इनाम देकर अपने यहां से विदा किया।

 गुणी बुढा द्वारा रानी की अंगूठी खोज करना-

कुछ दिनों के बाद फिर एक घटना हुई। बात थी कि रानी साहिबा की सोने की एक अंगूठी कहीं खो गई थी या किसी ने चुरा ली थी। उस अंगूठी की खोज हर जगह की गई; किंतु, न तो वह अंगूठी ही मिली और न चोर ही पकड़ा जा सका। वैसी स्थिति में राजा साहब को उस बूढ़े की याद आई जिसने बाघ को मार डाला था। अतः, उस बूढ़े को अपने यहां मंगवाया गया। राजा साहब ने उस बूढ़े से कहा, “तुम तो एक गुनी आदमी हो; जो काम दूसरों से नहीं हो सकता है वह तुमसे हो जाता है। तुमने ही उस बाघ को मारकर उसके उपद्रवों से लोगों को बचाया है। इस बार मेरी रानी साहिबा की एक अगूंठी कहीं खो गई है या किसी ने चुरा ली है। उस अंगूठी को तुम खोज दो तो तुम्हें उचित इनाम मिलेगा।

राजा साहब की बात सुनकर वह बूढ़ा चिंता करने लगा, “मैं तो कोई मंत्र-तंत्र जानता नहीं हूं; भला, रानी साहिबा की अंगूठी कहां से, कैसे खोज निकालूं ?” यह सोचकर वह बूढ़ा जो सो बहाने बनाने लगा। उसने कहा, “राजा साहब, मैं बहुत दूर से चलकर यहां आया हूं। इसलिए भूख तो मुझे लगी ही है, थक भी गया हूं। मैं कुछ खा-पीकर जरा आराम कर लेता तो उस अंगूठी के बारे में कुछ सोचता-विचारता ।”

इस पर उस बूढ़े को भोजन करने के लिए भरपूर अच्छी-अच्छी चीजें दी गईं; परंतु, उस बूढ़े ने कहा, “मैं यहां नहीं, राज-दरबार के बगल से बहनेवाली नदी के पास ले जाकर भोजन करूंगा। वहीं मैं स्नान भी कर लूंगा और भोजन करके यहां वापस आ जाऊंगा।” उसने सोच रखा था कि इसी बहाने राज-दरबार से निकलकर कहीं भाग जाऊंगा, नहीं तो मुझे राजा साहब के कोप का भाजन बनना पड़ेगा। यह सोचकर वह बूढ़ा नदी की ओर जाते हुए यह बोलता जा रहा था कि, “लारी कि पारी, खेये तो ली; लारी कि पारी, खेये तो ली !” (सकूं या न सकूं, भोजन तो कर लूं, सकूं या न सकूं, भोजन तो कर लूं ) संयोगवश, उस बूढ़े की वह बात रानी साहिबा की दो दासियों के कानों में पड़ी जिनके नाम ‘लारी’ और ‘पारी’ थे। अतः, उन दोनों दासियों के मन में हुआ कि हो-न-हो इस बूढ़े ने हमारी चोरी पकड़ ली है। यदि बात खुल जाएगी तो हमारी बड़ी फजीहत होगी, सजा मिलेगी सो अलग। चोरी उन्हीं दोनों दासियों ने की थी। अतः, वे दोनों दासियां उस बूढ़े का पीछा करती हुई नदी तक गईं और बड़े अनुनय-विनय के साथ उसका निहोरा किया, “बाबा, कृपा करके हमारी लाज बचाएं; हम दोनों के नाम जाहिर न करें। हम दोनों से बहुत बड़ी गलती हो गई है। ऐसी गलती फिर कभी नहीं होगी।”

उस बूढ़े ने कहा, “सो तो ठीक है, लेकिन वह अंगूठी है कहां ? यह तो बताओ।” इस पर उन दासियों ने कहा, “बाबा, वह अंगूठी हमने अमुक गोबर के ढेर के पास, बाईं ओर, जमीन में गाड़ रखी है।” उस बूढ़े ने कहा, “ठीक है, तुम दोनों के नाम मैं नहीं खोलूंगा; परंतु, कान पकड़ो कि ऐसा काम फिर कभी नहीं करोगी।” दोनों दासियों ने कसम खाई कि वैसा काम वे दुबारा नहीं करेंगी। उस बूढ़े ने सोचा, “जिस डर से मैं यहां से भाग जाना चाहता था वह काम तो हो गया; अब भागने से क्या फायदा?” अतः, वह बूढ़ा नदी के किनारे भोजन करके राज दरबार में लौट गया।

कुछ देर के बाद दरबार लगा तो भारी भीड़ के बीच उस बूढ़े से उस अंगूठी के बारे में जिज्ञासा की गई कि वह (अंगूठी) कहां है और उसका चोर कौन है। इस पर उस बूढ़े ने कहा, “आपको अंगूठी से मतलब है कि चोर से ? चोर का नाम जानकर क्या होगा ? उस पर जोर नहीं दिया जाए तो अच्छा।”रानी साहिबा की ओर से कहा गया, “ठीक है, अंगूठी मिल जाय, यही बहुत है।” तब उस बूढ़े ने कहा, “वह अंगूठी अमुक गोबर के ढेर के पास, बाईं ओर, जमीन में गाड़ी हुई है; वहां की जमीन खोदकर वह अंगूठी निकलवा ली जाए।” तदनुसार, वहां की जमीन खुदवाई गई और वह अंगूठी मिल गई। उस बूढ़े को भरपूर इनाम देकर विदा किया गया और वह खुशी-खुशी अपने यहां लौट आया।

 गुणी बुढा द्वारा वर्षा की  घोषणा करना- 

कुछ दिनों के बाद एक घटना और घटी। उस राजा के राज में वर्षा नहीं हो रही थी। लोग परेशान थे। अतः, लोगों ने राजा साहब से अनुरोध किया कि उस संबंध में कोई उपाय वे करें। तभी राजा साहब को उस बूढ़े की याद आई। तब, उन्होंने उस बूढ़े को अपने यहां बुलवाकर उससे कहा, “तुम तो एक गुनी आदमी हो। हमें बताओ कि वर्षा कब तक होगी।” साथ ही, राजा साहब ने अपने सिपाहियों को हिदायत दे दी कि आज तो सांझ हो गई है; इस बूढ़े के भोजन-भाजन और सोने का इन्तजाम कर दिया जाए और कल इसे खिला-पिलाकर दरबार में हाजिर किया जाए। इस बीच इसे सोचने-विचारने का समय मिल जाएगा।तदनुसार, उस बूढ़े को भरपूर भोजन करवाकर उसके सोने का इंतजाम एक कमरे में करा दिया गया; परंतु, वह बूढ़ा यह सोचते हुए परेशान था कि राजा साहब के उस विकट प्रश्न का उत्तर कैसे दिया जाए। अतः, रात को लोगों के सो जाने पर वह बूढ़ा चुपके से वहां से भाग जाने को निकला; परंतु, रात के अंधेरे में एक कुएं में जा गिरा। संयोग से उस कुएं में पानी बहुत थोड़ा था और वहां कुछ मेढक थे। वे मेढक आपस में बोल रहे थे, “टर्र-टर्र, कल तीसरे पहर पानी पड़ेगा; टर्र-टर्र, कल तीसरे पहर पानी बरसेगा।” मेढ़कों का वैसा टर्राना सुनकर उस बूढ़े ने सोचा, “जिसके डर से मैं भागा जा रहा था उसका उत्तर तो मिल गया। अब भागने से क्या फायदा?” यह सोचकर वह बूढ़ा उस कुएं के अंदर से चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगा कि, ‘मैं अचानक कुएं में गिर पड़ा हूं, मुझे यहां से निकाला जाए।’ इस पर उसकी बात सुनकर उसे उस कुएं से निकाला गया। तब उस बूढ़े ने कहा कि उसे रात में पेशाब लगा था और जब वह पेशाब करने को निकला था तब अनजान जगह और अंधेरी रात होने के कारण वह उस कुएं में गिर पड़ा था  सुबह होने पर उस बूढ़े को अच्छी तरह भोजन करवाकर समय पर राज-दरबार में हाजिर करवाया गया। वहां उस बूढ़े ने कहा, “आपलोग परेशान न हों; आज ही तीसरे पहर वर्षा होगी।” ऐसा कहते हुए वह बूढ़ा डर भी रहा था कि यदि तीसरे पहर वर्षा नहीं हुई तो उसकी खैरियत नहीं। परंतु, दिन का तीसरा पहर होते-होते सचमुच काफी वर्षा हुई। इससे राजा साहब और उनके राज के अन्यान्य लोग बहुत प्रसन्न हुए तथा उस बूढ़े को पहले से तिगुना अधिक इनाम देकर विदा किया गया।

इस प्रकार, एक गरीब डरपोक बूढ़ा, गनी बूढ़ा बन गया और आसपास के लोगों में मान सम्मान बढ़ गया और सबसे बड़ी बात यह रही इसके बाद से उसकी पत्नी प्यार से रहने लगी  ।

 स्रोत:-

संथाली लोक कथा

डोमन साहू समीर (संथाली साहित्यकार)

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