Nagpuri lok katha gidh gidhin | नागपुरी लोक कथा गीध–गिधिन

Nagpuri lok katha gidh gidhin :यह लोककथा पुरानी पीढ़ियों की जीवन–संघर्ष और भावनाओं को उजागर करती है। कहानी में कजरी नामक एक गरीब स्त्री का चित्रण है, जो जंगल–पहाड़ से कंद–मूल, लकड़ी और पत्ते इकट्ठा कर अपना जीवन यापन करती है। उसके जीवन में करुणा, मातृत्व और संघर्ष का अद्भुत संगम दिखाई देता है।कथा यह भी दर्शाती है कि प्रकृति और जीव–जंतु मनुष्य के जीवन से कितने गहरे जुड़े होते हैं। गीध–गिधिन द्वारा बच्चे का पालन–पोषण करना, फिर उसके असली माँ से मिलन और अंततः दुखद परिणति—यह सब जीवन की अनिश्चितताओं और भावनात्मक गहराइयों को सामने लाता है। इस कहानी में माँ–बेटे का संबंध, जीवों की करुणा, और मनुष्य की असुरक्षा का मार्मिक चित्रण है। यह लोककथा हमें यह सिखाती है कि जीवन में प्रेम और अपनापन सबसे बड़ा आधार है, परंतु भाग्य और परिस्थितियाँ कभी–कभी उसे दुखांत बना देती हैं। नागपुरी भसा में कहानी इस पारकर है –

नागपुरी लोक कथा गीध–गिधिन की  कहानी

पुरना जमाना के बात हे । पहाड़ तरिया एक गाम में कजरी नांव के जनानी रहय। ऊ बहुते गरीब रहय। ओकर जीयाबे के आसरा रहय जंगल–पहाड़। जंगल से कंद–मूल, झूरी–काठी लाके पेट भरय। कखनी लकड़ी बेचय, कखनी पिठइर, कखनी पात–दतुन बेचके गुजारा करय। बरखा ऋतु में जब करील फुलय, बाँस करील निकलय, त ओकर तोर लाके गुंगू पात में लपेटके बजार में बेचय।

एक दिन करील तोरय गेल रहय। ओही दिन ओकरा बाथा उठल, आउर ऊ एक बेटा जनम देलक। कजरी सोचलक—“ए बच्चा के कहाँ राखी? नीचे राखी त जानवर खा लेत, गाछ पर राखी त गीध–चील नोच लेत।” आखिर ऊ आसन पात बिछाके, केउंद पात ओढ़ाके बच्चा के राखलक आउर अपन काम में लग गेलक। बच्चा रोवय लागल।

ओही रोवा सुनके नजदीक गाछ पर बइठल गीध–गिधिन देखलक। गीध कहलक—“आज त बढ़िया शिकार भेटल। नरम–नरम मांस खाब।” गिधिन कहलक—“नइ, मोएँ ई बच्चा के नी खामू। मनुख के छउवा के पोसब।” पहिले गीध सोचलक—“गीध होके बच्चा पोसब?” मुदा गिधिन के जिद पर ऊ मान गेलक।

कजरी जब घुरलक त बच्चा न देखलक। ऊ रो–रोके गीत गाबय लागल—

“आसन पात बिछना, केउंद पात ओढ़ना, कहाँ गेले बेटा, कोन बन रे?”

गीध–गिधिन बच्चा के पोस–पोसके बड़ा करलक। बच्चा ओमन के माँ–बाप कहय लागल। ऊ कंद–मूल खाके अपन पेट भरय आउर ओमन के देखभाल करय। गीध–गिधिन ओकरा बहुते दुलार करय। मुदा डर रहय कि बच्चा अपन असली माँ–बाप के खोजे न चलि जाय। ओही ले गीध कहलक—“बेटा, सब दिशा जइयो, मुदा उत्तर दिशा नइ जइयो।”

मुदा बच्चा सोचलक—“बाबा उत्तर दिशा काहे मना करय?” आखिर एक दिन ऊ उत्तर दिशा में चलि गेलक। ओतय गाम भेटलक। ऊ गीत गाबय–गाबय भीख माँगय—

“आसन पात बिछना, केउंद पात ओढ़ना, दे बाबा भीख।”

गाम के लोग भावुक होके भीख देलक। आखिर ऊ अपन माँ कजरी के घर पहुँचल। गीत सुनके कजरी बाहर आयल आउर बच्चा के पहचान गेलक। आँसू बहय लागल। बच्चा पहिले मानल नइ—“मोर माँ–बाप त पंछी हें।” मुदा कजरी ओकर नोंह–केस कटलक, नहुवायल–धुवायल आउर अपन करेजा से लगाय लेलक। घर में खुशी छा गेलक।

मुदा गीध–गिधिन बच्चा के खोजय लागल। जब ऊ नइ भेटलक त उमन दुखी होय गेलक। गीध कहलक—“हमरे भूखे पेट रहके बच्चा पोसलक। मुदा फल का भेटल? आखिर मनुख पंछी के माँ–बाप कखनी मान सकय?”

कजरी डरय लागल कि गीध–गिधिन बच्चा के नोकसान न करय। ऊ जंगल जाना छोड़लक। मुदा घर में चुल्हा बुझि गेलक। बच्चा भूख से बिलखय लागल। आखिर ऊ जंगल चलि गेलक। ओतय गीध–गिधिन ओकरा देखलक आउर झपटके मारलक। ओकरा नोच–नोचके खा गेलक।

कजरी जब घुरलक त अंगना में हाड़ देखलक। ऊ समझ गेलक कि ओकर बेटा के गीध–गिधिन खा गेलक। ऊ रो–रोके प्राण त्याग देलक।

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