कोल जनजाति (Kol Tribe)

Kol Tribe of Jharkhand | झारखंड की कोल जनजाति का इतिहास और वर्तमान स्थिति

कोल जनजाति Kol Tribe : ऐतिहासिक मान्यता एवं सामाजिक स्थिति कोल जनजाति (Kol Tribe) को भारत सरकार द्वारा 8 जनवरी 2003 को झारखंड राज्य के 32वें अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) के रूप में आधिकारिक मान्यता दी गई। यह समुदाय झारखंड के संथाल परगना एवं उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल के दुमका, देवघर, गिरिडीह आदि जिलों में विशेष रूप से निवास करता है। कोल जनजाति की प्रजातीय संरचना ‘कोलेरियन’ समूह से संबंधित है, जो प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड नस्ल में आती है। इनकी भाषा ‘कोल’ है, जो ऑस्ट्रीक भाषा परिवार का हिस्सा है और संथाली भाषा से मिलती-जुलती है।

 “कोल जनजाति: पहचान और इतिहास”

कोल जनजाति को झारखंड सरकार द्वारा वर्ष 2003 में अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त हुआ। यह समुदाय झारखंड की जनजातीय सूची में नवीनतम प्रवेश पाने वाली जातियों में से एक है।
इस कारण, इनके संबंध में कई आँकड़े अभी संकलित नहीं हो सके हैं।परंतु, कोल—यह शब्द कहाँ से आया? इसका अर्थ क्या है? इन सवालों के उत्तर आज भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। इतिहासकारों के अनुसार, इस शब्द का प्रयोग कभी झारखंड क्षेत्र के आदिवासियों के लिए, विशेष रूप से संथाल, मुंडा, हो, खड़िया और उरांव के लिए हिन्दू समुदाय द्वारा किया जाता था।मार्कण्डेय पुराण में “कोल”, “कालकेय” और “असुर” जातियों का उल्लेख मिलता है।प्राचीन काल में ‘असुर’ शब्द को समस्त कोलेरियन जातियों का प्रतिनिधि माना जाता था। महाभारत और रामायण में भी कोल, किरात, निषाद और शबर जैसे समुदायों की चर्चा मिलती है। कई विद्वान कोल समुदाय को शबर जाति का अंग मानते हैं।जो इस प्रकार है –

  • कनिंघम के अनुसार, कोल के विभिन्न दल प्राचीन काल में शबर नामक समूह के अंतर्गत आते थे।
  • पाणिनी ने कोल शब्द की व्युत्पत्ति ‘कुल’ से मानी है—जो समस्तता का बोध कराता है।
  • कैम्पबेल ने इसे कोला, कोरा या कोड़ा जैसे रूपों से जोड़ा,और कहा कि यह शब्द मुंडारी भाषा परिवार को दर्शाता है।
  • बिलफोर्ड और कर्नल डाल्टन जैसे विद्वानों ने भी कोल और कोलेरियन शब्दों को आस्ट्रिक यानी मुंडा भाषायी समूह से जोड़ा।
  • कुछ विद्वानों की मानें तो ‘कोल’ शब्द ‘होड़ो’ का एक रूपांतरण है।जबकि अन्य यह मानते हैं कि द्रविड़ियन और कोलेरियन जातियाँ मूलतः एक ही वंश की शाखाएँ हैं।
  • कनिंघम ने ‘कुलिंद’ देश की उत्पत्ति भी कोलेरियन जातियों से जोड़ी है। इतिहास के कुछ उल्लेखों के अनुसार, भारत को कभी कोलारिया भी कहा गया था।
  • शरतचन्द्र राय जैसे नृविज्ञानियों ने “मुंडा अथवा कोल” शब्द का प्रयोग किया, जिससे यह संकेत मिलता है कि मुंडा और कोल मूलतः भिन्न नहीं हैं।

दरअसल, कोल कोई एक जाति नहीं, बल्कि एक वर्गगत शब्द था।जो कई जनजातीय दलों के लिए सामूहिक रूप से प्रयुक्त होता था।समय के साथ-साथ, भौगोलिक विभाजन, सांस्कृतिक भिन्नता, और सामाजिक पिछड़ेपन ने इनके अलग अस्तित्व को जन्म दिया — और आज ये एक स्वतंत्र जनजाति के रूप में पहचाने जाते हैं। तो यह था कोल जनजाति का संक्षिप्त परिचय — इतिहास, पहचान और सामाजिक विकास की कहानी। झारखंड की धरती पर फैले विविध आदिवासी समुदायों में कोल की भूमिका अनदेखी नहीं की जा सकती।

कोल जनजाति (Kol Tribe)  की सामाजिक संरचना

गोत्र व्यवस्था और वंश परंपरा

कोल समाज में 12 प्रमुख गोत्र प्रचलित हैं, जो संथाल जनजाति के समान हैं:

इांसदा

मुर्मू

किस्कु

मरांडी

बासके

बेसरा

सोरेन

टुडू

हेम्ब्रम

चांउडे

चुनियार

किसनव

यह समाज पितृसत्तात्मक है, जिसमें वंश परंपरा पिता की ओर से चलती है। पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकारी पुत्र होता है। एक ही गोत्र में विवाह और यौन संबंध दोनों सख्त रूप से वर्जित हैं, जिससे सामाजिक अनुशासन बना रहता है।

कोल जनजाति (Kol Tribe)  की विवाह परंपराएं

वधू खोज की अनूठी परंपरा- कोल समाज में संथाल जनजाति के विपरीत, जीवनसाथी खोजने की जिम्मेदारी लड़की वालों पर होती है। वधू पक्ष योग्य वर की तलाश में रहते हैं। जब उपयुक्त वर मिल जाता है, तो वधू पक्ष के पांच लोग लड़के के घर जाकर उसे परखते हैं। अधिकांशतः मेले या बाजार में लड़का देखने की परंपरा है। यदि लड़का पसंद आ जाता है, तो शादी की तिथि तय होती है।

विवाह की प्रक्रिया- विवाह के दिन वर पक्ष बारात लेकर वधू के घर जाता है। ‘सवा रुपया’ वधू मूल्य (पोटे) देकर विवाह सम्पन्न होता है। वर कन्या के माथे पर सिन्दूर लगाता है। विवाह में गांव के प्रधान ‘मांझी’ की उपस्थिति अनिवार्य है, क्योंकि वह मुख्य गवाह होता है।

कोल समाज में विधवा विवाह को भी मान्यता प्राप्त है।

जन्म, संस्कार एवं मृत्यु परंपराएं

प्रसव एवं शुद्धिकरण – गर्भवती महिला का प्रसव घर की अनुभवी महिलाओं द्वारा कराया जाता है। शिशु जन्म के बाद कांसे की थाली बजाकर पूरे गांव में सूचना दी जाती है। छठे दिन ‘छठी’ होती है, जिसमें तुलसी जल से शुद्धिकरण किया जाता है।

कर्णभेदन संस्कार –बच्चों के पांच वर्ष की आयु में कान छेदन की परंपरा है: लड़कों का कान ऊपर से लड़कियों का कान नीचे से तांबे या चांदी के तार से छेदन किया जाता है।

मृत्यु परंपरा- मृत व्यक्ति को दफनाना या जलाना दोनों प्रथाएं प्रचलित हैं। बाल्यकाल में मृत्यु होने पर तीसरे दिन श्राद्ध और शुद्धिकरण होता है। सामान्य मृत्यु पर दसवें दिन संस्कार पूर्ण होता है। श्राद्ध के अवसर पर पुजारी (पाहन) सूअर और मुर्गे की बलि देता है। अगिनमुखिया को पवित्र जल से स्नान कराते हैं, फिर रात में सामूहिक भोज होता है।

कोल जनजाति (Kol Tribe) की आर्थिक एवं धार्मिक स्थिति

पारंपरिक पेशा एवं वर्तमान स्थिति

कोल समाज का पारंपरिक व्यवसाय लोहा गलाना और कृषि उपकरण बनाना था, जो आज विलुप्ति के कगार पर है। गिरिडीह के पीरटांड क्षेत्र में कुछ परिवारों में अब भी यह कार्य जारी है। वर्तमान में अधिकांश लोग मजदूरी कर जीवन-यापन करते हैं और आर्थिक स्थिति दयनीय बनी हुई है।

धार्मिक आस्था

  • कोल जनजाति प्रकृति पूजक है।
  • सिंगबोंगा (सूर्य देवता) इनका प्रमुख देवता है।
  • ‘सरना’ धर्म स्थल है, जहां ग्राम देवताओं की पूजा होती है।
  • आजकल हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा का चलन भी बढ़ा है।

राजनीतिक और न्याय प्रणाली

  • कोल समाज में पंचायत आधारित न्याय व्यवस्था है।
  • गांव का मुखिया ‘मांझी’ कहलाता है।
  • मांझी बुजुर्गों की सलाह लेकर विवादों का निपटारा करता है।

शिक्षा और सामाजिक विकास

  • कोल जनजाति शिक्षा के क्षेत्र में बेहद पिछड़ी है।
  • केवल 2 से 3 प्रतिशत लोग साक्षर हैं।
  • महिलाओं में साक्षरता नगण्य है।

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