खोरठा लोक कथा धनेक धधेनी | khortha Lok katha Dhanek Dhadheni

khortha Lok katha Dhanek Dhadheni :- खोरठा लोक कथा के इस कहानी में पशु पक्षियों एवं मानव के बीच प्रेम सौहार्द को दिखाया गया है । किसी गांव में एक गरीब परिवार रहता था जिसमें एक मां और उसका बेटा जो किसी प्रकार अपने जीवन जी रहे थे । अचानक उसके जीवन में एक पशु बंदर के द्वारा बदल जाता है और वह एक अमीर व्यक्ति के रूप में गिने जाने लगते हैं । किंतु जैसे-जैसे यह परिवार अमीर होते जाता है वैसे ही बंदर के प्रति भी प्यार घटने लगता है । इसकी परीक्षा जब बंदर ने ली तो बंदर के होश उड़ गए । झारखंडी लोक कथा (khortha Lok katha) कि यह कहानी को हम देखते हैं-  

एगो गाँव एगो बुढ़ी रहो हेल  ओकर  एगो बेटा हल जेकर नाम  चमटू हेल ।दुनु कोन्हों रकम माड़ भात खा के  दिन काट – हला । एकदिन बुढ़ी चमटू के  टाका दइके कहलइ- ” जो , बाजार  आर कोन्हो बेपार कर ना तो  का करबे ।  रुपाक टाका लइके हाट गेल । सारा दिन हाटे दोकान – दारी देख के चमतु  थइक गेल तावो कोन्हों चीज ओकराँ पसिन्द नाँइ भेल । बेचारा करत तक मुठे हाँथे घार धारले मयिक दुन्दरनी सुने हतइ ! तखन देइर बुइझवाइझ के देखन आर गिरती बेरें पाटाइ – सोटइ के एगो बांदर किनल आर मुँह – आंधारे धार दुरल बेटाक काम देखके बुढ़ी रार्गे झान – झानाइ गेली ।  हाँ रे कुलांगार हाइ   तोरा और कुछ नाइ मिल उ येहे  बांदार टा कि करबे ?  एतना कहके छमकल भीरत बाटे दुकली । बेचारा चमटू तऽ सुखाइ गेल । एक तो  सारा दिन मुखें – पियामें  मोइर के  एगो बांदर आनल , उपर से माँएक बोली सुइन के असथिर इ उठल । चमटू के कांदू – कांदू देइख के बांदर बुढ़ी टिनें गेल आर कहलइ- ” माई , चमटू के नाँइ धमकाहीं । हामें खुभे सोना – रुपा आइन देवउ ।

” दोसर दिन बांदर झलफले उठल आर बहुत धुर एगो राजाक महले गेल एगो गाँठी मनेक – मतन सोना – रुपा बांधल आर घार आइन के बुड़िक दइ देलइ बुढ़ी एते सोना – रुपा देइखकें हुइवें गदगादाइ उठली । चमटू के तो चुमाक मारी तडे नाँइ आर बांदरो के ‘ बेटा बेटा ‘ कहे लागलइ । वइसने , बांदर कथियो रुपाक टाका आने लागल तो कथियो मूंगा – मोती । देखइतें – देखइतें , बांदरेक परतायें चमटू राजा बइन गेल । पोंआर परेक जघन् बोड़ – बोड़ गढ़ गुढ़ा बइन के तइयार लाखेक कारबार चले लागलड़ । घोड़ा – हाँथी धार भोइर गेलइ दूधेक बान बोहे लागलइ । गाँवक कते – कते लोक चमटूक धारें मुनीस खटे खातिर हामागोड़ी दिए लागला । पोरेक खाइके परत पुरोहित गुलइन तो पूजा – पाठेक खातिर चमटू धारें नाकदाररा दिए लागल्थिन । रसें – रंगे डूबल चमटू उदम साँढ़ रकम घुरे लागल बुढिक सान तो देखइक नीयर बुढ़ीं , बांदरेक खातिर एगो रुपाक खाटी बनाइ देल आर दुलार – पिवार से ओकरों

बुढ़ीं , बांदरेक बेस  लाखे  खिवे – पिवे लागलइ । चमटू – धारक ताम – झाम देख के आस – पासेक लोक मुंई हाँथ कुछु दिन बीतल बादें , एकदिन बांदरें बुढ़ी के आपन ठिन डाइकके जिबउ तनि झलफले जलपान कइर दिहें ” . कहलइ- ” माइ , अबरी दादाक बीहा दिएक चाही । काइल हार्मे एकठिन कनिया देखे दोसर दिन जलपान कइर के बांदर झलफले घार ले बाहराइल आरर बेरा चाखें बइसइते एगो राजाक राजें गेल । बांदर के खूब मान – सत्कार भेल ।  बांदर पोगराइ – पोगराइ खाइ लागल आर ‘ चमटू राजाक ‘ बरतुपातेक काथा बातरा करे लागल । बरतुपातेक काथा सुइन राजाक खुसिक ठेकान नाँइ ।  तकर बादें बिहाक दिन – ठेकान धराइ के बांदर हाँसल – खेलला आइल |

       बुढ़ीं सुनली तऽ गरबें फुइल गेली | अबरी तऽ बुढ़ीं बांदरेक गोड़ें तेलो मखवे लागली । दुलारेक तऽ कोन्हों सीमा नाँइ ! आर एक दिन हाँसी , खुसीं चमटूक बीहा भइ गेलइ बुढ़िक हाँथें सरगेक चाँद आइ गेल । दिन – राइत बहु – बेटाञ् डूबल रहे लागली । बांदरेक खोज – पुछाइर भला के करे ने चमटूञ कखनो बांदरेक टावान ले , ने चमटूक बहुहीं । उपर ले जोदि कखनो बांदर चमटूक बहु के ‘ भउजी – भउजी ‘ कहे तो ऊ बांदर के खखुआइ लेइ बांदर ने हिंदेक रहल , ने हुंदेक । गोठें गनाय आर ने पाधाञ् बाधाइ ! बांदरेक आँखीं आर नींद नाँइ ! तखन – एकदिन बांदरें बुढ़ी के डाइक के पुछलइ- “ माँइ ! दादाक तऽ बीहा भइ गेलइ । अबरी हाम जोदि मोइर जाए तो तोंय कि करवें ? ” तखन बुढ़ीं कहलइ ” हाँ बेटा , अइसन आब – खाव काहे बोके ? तो मोरले हामें खुभे कांदबद आर तोराँ चंदन – काठें पोड़इबउ आर फइर तोय मोरलें । हामें कि आर बाँचब बेटा ? “

दोसर दिन बांदर मोरइक नाटक करल । देखे खातिर कि ई सोब कि करता । बिहानहीं जखन बूढ़ीं देखली कि बांदर निस्टो मोइर गेल तऽ तनि इथाइर – उधाइर उलटाय – पालटाय देखली । मल्किन , धनेक गरबें एको तनि कांदली नाँइ बांदर एकदम सुगुम बुढ़ी नाकवा आरो दाइब के चमटूक डाकली आर कहलइ- ” एहे देखीं बेटा , बांदरा मोरलउ । जउ एगा पोऑर डोराञ् बाँइधके खेत बाटें फेइक देवी ने तक गमकता ” ई सोब बात सुइनके बांदरेक गोड़ेक लहडर मगले फूटला भने करल – बाह गे बुढ़ी , उगला खाली छइब करऽ हलें । अच्छा अबरी बुझयें । दौड़ा – दौड़ी चमड बांपरेक गोड़े बांधल आर टानल – धिंसरयल खेत बटि लेग के बांदर के फेइक देलका बेचारा बांदरेक एक पूर चाम छालाइ गेलइ बांदर कोन्हों रकम ‘ भाँइ गो – बाप गो कइरके उठला ताव तक मुँह – आंधरा भइ गेलइ बांदर एगो तितकी लइके चमटूक गढ़े आइग लागाइ देलइ सभीन पोइड्के मोइर गेला बांदर आपन आँइख टेहना लइके ऊ वेस से पाराइ गेल । 

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