झारखंड के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा के मर्मज्ञ डॉक्टर गिरधारी राम गंझू (Girdhari ram ganjhu)जी को मरणो उपरांत पदम श्री पुरस्कार से 73 वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या के अवसर पर पुरस्कार देने की घोषणा की गई। यह पुरस्कार शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्य के लिए इन्हें प्रदान किया गया है। डॉ गिरधारी राम गंझू का जन्म खूंटी जिला के बेलवादाग में 5 दिसंबर 1949 ईस्वी को हुआ था ।प्रारंभ से ही उनका जीवन संघर्ष पूर्ण रहा है। अपने संघर्ष एवं मेहनत के द्वारा झारखंड में भाषा साहित्य के क्षेत्र में अपना उल्लेखनीय योगदान दिया। झारखंड के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा झारखंड की कला संस्कृति को पहचान दिलाने में डॉ रामदयाल मुंडा, डॉक्टर बीपी केसरी, पदम श्री मुकुंद नायक, से जुड़कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


डॉ गिरधारी राम गंझू
डॉ गिरधारी राम गंझू झारखंड के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा भाषा के मर्मज्ञ ही नहीं बल्कि झारखंड के लोक साहित्य यहां की लोक संस्कृति, गीत संगीत के भी बड़े विद्वान थे। उन्होंने झारखंड के लोक संस्कृति को पहचाना और इस संस्कृति को झारखंड से लेकर देश के अन्य कोने तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ गिरधारी राम गंझू (Dr.Girdhari ram ganjhu) न केवल झारखंड के गीत संगीत से लगाव रखते हैं बल्कि सुदूर जंगलों पहाड़ों तक बसे हुए गांव के जल तरंगों की एकक ध्वनि भी पहचानते थे। उन्होंने दिन-रात के अलग-अलग पहरों में गए जाने वाले लोकगीतों की विस्तार से चर्चा अपनी पुस्तक झारखंड का लोक संगीत में किया है। विभिन्न प्रकार के मौसम में झारखंड के लोक नृत्य का स्वच्छता में वर्णन इन्होंने किया है। इतना ही नहीं उन्होंने झारखंड की पारंपरिक कलाएं काफी विस्तृत शोध किया है। झारखंड में आदिवासी और सदनों के द्वारा अपनाए गए विभिन्न प्रकार के कला काष्ठ कला, लोक चित्रकला, हस्तशिल्प कला, पारंपरिक मिटी कला, पारंपरिक गृह निर्माण कला, रसोई खानपान कला का विस्तृत वर्णन इन्होंने किया है। उनका झारखंडी साहित्य और जनजीवन के प्रति यह लगाव को दर्शाता है । इनकी इस विद्वता के लिए दिया गया पद्यम श्री आज जीवित होते तो उसका अलग अनुभूति होता । लेकिन साहित्य और शिक्षा ही ऐसा क्षेत्र है जो लोगो को मारने के बाद भी जीवित रखता है । आज उनकी सांसे धरती पर नही है किंतु उनके द्वारा किये गए असाधरण कार्य के उन्हें जीवित रखा है। खोरठा साहित्य कार डॉक्टर अजीत कुमार झा ने ठीक ही लिखा है
मरेक लूर सीखा संगी, बाचे अपने आ ई जेतो।
मरेक लूर सीखले संगी ,इतिहास आपने बाचे देतो।।
अर्थात मरने का जो तरीका सीख लिए हैं, उसे बचने का तरीका भी मालूम हो जाता है। ऐसे लोग इतिहास के पन्नों में सदा अमर हो जाते हैं। इसलिए समाज ,देश के लिए ईर्ष्या ,द्वेष, लालच ,स्वार्थ इत्यादि से परे होकर जो कार्य करता है वे लोग सदा अमर हो जाते हैं।
डॉ .गिरधारी राम गंझू का सामान्य परिचय
नाम:– गिरधारी राम गंझू “गिरिराज”
जन्म:-5 दिसम्बर 1949 ईसवी
निधन:-15 अप्रेल 2021 ईसवी
माता पिता :– लालमणि देवी,इंद्रनाथ गंझू
निवासी :– ग्राम वेलवादग, खुंटी, झारखंड
शिक्षा:- एम ए( हिंदी),बीएड, एल एल बी,पी एच डी
सेवा:- प्रध्यापक, पूर्व विभागा अध्यक्ष ,जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग,रांची विश्व विद्यालय ,रांची।
डॉ. गिरधारी राम गंझू प्रमुख रचना:-
- पीटर शांति नवरंगी, व्यक्तित्व एवं कृति। प्रकाशन वर्ष 1990
- झारखंड का अमृत पुत्र :मारंग गोमके जयपाल सिंह। प्रकाशन वर्ष 2001
- महाराजा मदरा मुंडा । प्रकाशन वर्ष 2004
- नेरवा लोटा उर्फ सांस्कृतिक अवधारणा ।प्रकाशन वर्ष 2010
- नागपुरी के प्राचीन कवि। प्रकाशन वर्ष 2012
- हीरा नारायणपुर कर हीरा ।प्रकाशन वर्ष 2012
- नागपुरी लोक कथा संग्रह ।प्रकाशन वर्ष 2012
- झारखंड की पारंपरिक कलाएं ।प्रकाशन वर्ष 2015
- झारखंड का लोक संगीत ।प्रकाशन वर्ष 2015
- झारखंड की सांस्कृतिक विरासत। प्रकाशन वर्ष 2015
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बहुत सुंदर आलेख।
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