Birhor tribe | बिरहोर जनजाति सामाजिक आर्थिक राजनितिक और धार्मिक स्थिति की जानकारी

 

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बिहार और झारखण्ड की आदिम जनजातियों में बिरहोर जनजाति (Birhor tribe) का विशेष स्थान है। यह जनजाति मुख्यतः छोटानागपुर क्षेत्र के हजारीबाग, गिरिडीह, बोकारो, कोडरमा, गुमला और रांची जिलों के जंगलों व पहाड़ी इलाकों में छोटे-छोटे समूहों में निवास करती है। बिरहोर अत्यंत पिछड़ी और विलुप्ति की ओर बढ़ती हुई घुमंतू जनजाति है, जो अपनी सांस्कृतिक विशिष्टताओं के कारण उल्लेखनीय है। इनकी कुछ आबादी उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश की सीमावर्ती भूमि पर भी पाई जाती है। ये लोग घुमंतू अथवा अर्द्ध-घुमंतू जीवन जीते हैं। शिकार करना, भोजन एकत्र करना और रस्सी बनाना इनका प्रमुख व्यवसाय है। इनके जीवन की अनिश्चितता और निरंतर स्थान परिवर्तन के कारण सही जनगणना करना कठिन है।

बिरहोर जनजाति (Birhor tribe)  का नाम और अर्थ

‘बिरहोर’ शब्द दो मुण्डारी शब्दों से बना है— बिर (जंगल) और होर (मनुष्य)। अर्थात् बिरहोर का अर्थ है जंगल का आदमी। जंगल ही इनका घर, समाज और संस्कृति है। यही इनके सुख-दुःख, गीत-कथाओं और परंपराओं का आधार है।

बिरहोर जनजाति (Birhor tribe)  का जंगल से संबंध

बिरहोर जनजाति का जंगल से गहरा और आत्मीय रिश्ता है। वे जंगल को लूटते नहीं, बल्कि उससे जीवनोपयोगी वस्तुएँ प्राप्त करते हैं—कंद-मूल, फल-फूल, पत्तियाँ, शहद, जड़ी-बूटियाँ, पशुओं के लिए चारा, रस्सी बनाने हेतु चोप, और शिकार। यहाँ तक कि श्रृंगार के लिए भी वे जंगल के फूल-पत्तों का उपयोग करते हैं। जंगल और बिरहोर के बीच यह संबंध सहजीवी (symbiotic) है।

बिरहोर जनजाति (Birhor tribe)  का जनसंख्या और संकट

सरकारी घोषणाओं के बावजूद बिरहोर जनजाति आज भी अस्तित्व संकट से जूझ रही है। 1991 की जनगणना के अनुसार इनकी संख्या मात्र 4,377 दर्ज की गई थी। पहले की जनगणनाओं में भी इनकी जनसंख्या में उतार-चढ़ाव देखा गया है। उदाहरणस्वरूप, 1871 में इनकी संख्या 359 थी, जो 1931 तक बढ़कर 1,870 हुई और 1991 में 4,577 तक पहुँची। परंतु वास्तविक आँकड़े अनुमानित ही माने जाते हैं। 1973–1977 के बीच हजारीबाग, गिरिडीह और बोकारो जिलों के सात बिरहोर टंडा (चलकरी, बनासो, सिधाबारा, चलंगा, खम्भवा, डुमरी और अमनारी) में परिवार नियोजन के तहत 82 युवाओं में से 30 पुरुषों की नसबंदी कर दी गई थी। यह तथ्य इनके जनसंख्या संकट को और गहरा करता है।

बिरहोर जनजाति (Birhor tribe)  का शारीरिक बनावट और भाषा

बिरहोर लोगों का रंग गहरा, कद छोटा, बाल घुंघराले और नाक चौड़ी होती है। इन्हें प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड जाति समूह में रखा जाता है। इनका संबंध संथाल, मुण्डा और हो जनजातियों से है। भाषा की दृष्टि से वे विश्व की प्राचीनतम ऑस्ट्रिक भाषा परिवार की बोलियाँ बोलते हैं।

शारीरिक विशेषताएँ (Ethnological Features)

  • प्रजाति समूह: बिरहोर लोग प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड (Proto-Australoid) नस्लीय समूह से संबंधित माने जाते हैं।
  • रंग-रूप: इनका रंग गहरा (काला/श्यामवर्ण), कद छोटा और शरीर पतला होता है।
  • बाल और नाक: बाल घुंघराले या लहरदार होते हैं तथा नाक चौड़ी होती है।
  • अन्य विशेषताएँ: सिर लंबा (long-headed) और चेहरे की बनावट विशिष्ट होती है।
  • संबंधित जनजातियाँ: इनका सांस्कृतिक और जातीय संबंध संथाल, मुण्डा और हो जनजातियों से है।

बिरहोर जनजाति का विभाजन

बिरहोर समुदाय को दो प्रमुख वर्गों में बाँटा जाता है—

  • उठलु (Uthlu): ये लोग घुमंतू जीवन जीते हैं। वे अपने घर-बार और निवास स्थान को बार-बार बदलते रहते हैं और जंगलों में घूमते रहते हैं।
  • जांघी/बसलु (Janghi या Basalu): ये स्थायी रूप से एक स्थान पर बस जाते हैं और वहीं अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

टंडा और झोपड़ी (निवास व्यवस्था)

  • बिरहोर अपने गाँव या निवास स्थल को टंडा कहते हैं।
  • एक टंडा में सामान्यतः 3 से 20 झोपड़ियाँ होती हैं।
  • झोपड़ी को कुम्बा कहा जाता है। ये दो कतारों में बनी होती हैं और साल, मोहलाइन या अन्य पेड़ों की पत्तियों से तैयार की जाती हैं।
  • कुम्बा का दरवाज़ा बहुत छोटा होता है, जिससे अंदर जाने के लिए झुकना पड़ता है। दरवाज़ा बंद करने के लिए पत्तों की बनी टटरी प्रयोग की जाती है।
  • झोपड़ी के एक कोने में बकरियाँ बाँधी जाती हैं और दूसरे कोने में मिट्टी के बर्तन, ढोलकी, नगाड़ा और शिकार के उपकरण रखे जाते हैं।
  • झोपड़ी का निर्माण बेहद सरल है और दो-तीन लोग मिलकर इसे 3–4 घंटे में बना लेते हैं। इसकी ऊँचाई इतनी कम होती है कि कोई व्यक्ति इसमें खड़ा नहीं हो सकता।

टंडा संगठन

  • प्रत्येक टंडा का नेतृत्व एक सरदार करता है जिसे नाया कहते हैं।
  • नाया धार्मिक और सामाजिक दोनों मामलों में मार्गदर्शक होता है।
  • नाया की मृत्यु के बाद उसका पुत्र इस पद को ग्रहण करता है।
  • चूँकि बिरहोर का मुख्य व्यवसाय शिकार है, इसलिए धार्मिक और सामाजिक कार्यों में नाया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

बिरहोर जनजाति (Birhor tribe)  की  सामाजिक प्रणाली

  • बिरहोर समाज पितृसत्तात्मक है।
  • नातेदारी और गोत्र पितृवंशीय आधार पर निर्धारित होते हैं।
  • एक टंडा में सामान्यतः दो-तीन कुल समूहों के परिवार रहते हैं।
  • गोत्रों के नाम टोटेमिक वस्तुओं, पशु-पक्षियों और प्राकृतिक तत्वों पर आधारित होते हैं।
  • शरतचन्द्र राय ने जिन गोत्रों का उल्लेख किया है उनमें—इन्दुआर, केरकेटा, टोपवार, कछुवा, खेर, बसवार, घनवार, बराह, कौआ, गिद्ध, हेम्ब्रम, गेरूआ, गण्डारी, खड़िया, महली, सिगपुरिया, सुईया, तोरीयार आदि प्रमुख हैं।
  • बिरहोर लोग अपने टोटेमिक पशु-पक्षियों को न मारते हैं और न खाते हैं, बल्कि उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं।

विवाह प्रणाली

  • बिरहोर समाज में विवाह अनिवार्य माना जाता है और यह एक विवाही (monogamous) है।
  • विवाह हमेशा कुल समूह और टंडा के बाहर किया जाता है।
  • विवाह की कई विधियाँ प्रचलित हैं:
    • नाम नापम बपला / सदर बपला: प्रेम संबंध होने पर टंडा की अनुमति से विवाह होता है। इसमें नगद राशि और भोज्य सामग्री दी जाती है।
    • उड़ा-उड़ी बपला: लड़की अपने प्रेमी के साथ घर छोड़कर चली जाती है और बाद में भोज देकर समाज में पति-पत्नी के रूप में स्वीकार की जाती है।
    • बोलो बपला: प्रेम विवाह का एक रूप।
    • सिपन्द्र बपला: इसमें युवक लड़की के पीछे भागता है और विवाह की अनुमति प्राप्त करता है।
    • गोलहट बपला: दो टंडों के बीच लड़कियों का आदान-प्रदान होता है।
    • किरींग जमाई बपला: जब लड़का अत्यंत गरीब होता है और विवाह खर्च नहीं उठा सकता, तब वह लड़की के घर जाकर सेवा करता है। यह सेवा विवाह का रूप है।

बिरहोर जनजाति (Birhor tribe)   की आर्थिक स्थिति

बिरहोर समुदाय की आर्थिक दशा अत्यंत दयनीय है। उनका जीवन मुख्यतः जंगल पर निर्भर है। वे वर्ष भर जंगल से कंद-मूल, फल-फूल, साग-सब्जियाँ और अन्य प्राकृतिक संसाधन एकत्र कर जीवनयापन करते हैं। भोजन जुटाना ही उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। 1971 में एल. आर. एन. श्रीवास्तव के निर्देशन में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, नई दिल्ली द्वारा भारत के तीन राज्यों की 18 जनजातियों पर आर्थिक, शैक्षणिक और रोजगार संबंधी तुलनात्मक अध्ययन किया गया। इस अध्ययन में पाया गया कि बिरहोर जनजाति सभी स्तरों पर सबसे नीचे, अर्थात 18वें स्थान पर है। चतुर्भुज साहु ने अपनी पुस्तक बिरहोर – ट्राइब” में उल्लेख किया है कि बिरहोर इतने गरीब हैं कि गर्भवती महिलाओं को भी उचित भोजन नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप महिलाएँ और बच्चे कुपोषण का शिकार होकर असमय मृत्यु को प्राप्त होते हैं। यही कारण है कि उनकी जनसंख्या लगातार घट रही है। शोध अध्ययनों से यह भी स्पष्ट हुआ है कि बिरहोर का भोजन पोषण की दृष्टि से अत्यंत अपर्याप्त है। कैल्शियम को छोड़कर अन्य सभी आवश्यक तत्व—कैलोरी, प्रोटीन, लौह, फॉस्फोरस, विटामिन आदि—उनके भोजन में न्यूनतम स्तर से भी कम पाए जाते हैं। इस कारण वे शारीरिक वजन, स्वास्थ्य और कार्यक्षमता को संतुलित नहीं रख पाते। भविष्य की योजना बनाने या जीवन की गुणवत्ता सुधारने की क्षमता उनमें नहीं है क्योंकि वे न्यूनतम आवश्यक भोजन भी प्राप्त नहीं कर पाते। बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होता है, युवाओं में कमजोरी बढ़ती है और गर्भवती महिलाओं में कुपोषण के कारण उच्च मृत्यु दर देखी जाती है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि बिरहोर जनजाति का जीवन आरंभ से ही अल्प पोषण और कुपोषण से ग्रसित होता है। गर्भावस्था से लेकर संपूर्ण जीवन तक वे अपूर्ण वृद्धि, नस्लीय दोष और शारीरिक दुर्बलता से जूझते रहते हैं

जंगल पर निर्भरता

बिरहोर समुदाय का जीवन जंगल पर आधारित है। वे वर्ष भर कंद-मूल, फल-फूल, साग-सब्जियाँ और अन्य प्राकृतिक संसाधन एकत्र करते हैं। भोजन जुटाना ही उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।

अध्ययन और स्थिति

1971 में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, नई दिल्ली द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि भारत की 18 जनजातियों में बिरहोर आर्थिक, शैक्षणिक और रोजगार की दृष्टि से सबसे अंतिम स्थान पर हैं।

कुपोषण और स्वास्थ्य संकट

चतुर्भुज साहु के अनुसार, बिरहोर इतने गरीब हैं कि गर्भवती महिलाओं को भी उचित भोजन नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप महिलाएँ और बच्चे कुपोषण का शिकार होकर असमय मृत्यु को प्राप्त होते हैं। यही उनकी जनसंख्या घटने का एक प्रमुख कारण है।

पोषण की कमी

शोध से स्पष्ट हुआ है कि बिरहोर का भोजन पोषण की दृष्टि से अत्यंत अपर्याप्त है। कैल्शियम को छोड़कर अन्य सभी आवश्यक तत्व—कैलोरी, प्रोटीन, लौह, फॉस्फोरस, विटामिन आदि—उनके भोजन में न्यूनतम स्तर से भी कम पाए जाते हैं।

जीवन पर प्रभाव

भोजन की कमी के कारण बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होता है, युवाओं में कमजोरी बढ़ती है और गर्भवती महिलाओं में उच्च मृत्यु दर देखी जाती है। इस प्रकार उनका जीवन आरंभ से ही अल्प पोषण और कुपोषण से ग्रसित होता है, जिसके परिणामस्वरूप आगे चलकर अपूर्ण वृद्धि और शारीरिक दुर्बलता बनी रहती है।

बिरहोर जनजाति (Birhor tribe)   की आर्थिक स्थिति

बिरहोर समुदाय की आर्थिक दशा अत्यंत दयनीय है। उनका जीवन मुख्य रूप से जंगल पर निर्भर है, जहाँ से वे वर्ष भर कंद-मूल, फल-फूल, साग-सब्जियाँ और अन्य प्राकृतिक संसाधन एकत्र करते हैं। भोजन जुटाना ही उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। 1971 में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, नई दिल्ली द्वारा भारत के तीन राज्यों की 18 जनजातियों पर किए गए तुलनात्मक अध्ययन में यह पाया गया कि बिरहोर जनजाति आर्थिक, शैक्षणिक और रोजगार की दृष्टि से सबसे अंतिम स्थान पर है। चतुर्भुज साहु ने अपनी पुस्तक बिरहोर – ट्राइब” में उल्लेख किया है कि बिरहोर इतने गरीब हैं कि गर्भवती महिलाओं को भी उचित भोजन नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप महिलाएँ और बच्चे कुपोषण का शिकार होकर असमय मृत्यु को प्राप्त होते हैं। यही उनकी जनसंख्या घटने का एक प्रमुख कारण है। शोध अध्ययनों से यह भी स्पष्ट हुआ है कि बिरहोर का भोजन पोषण की दृष्टि से अत्यंत अपर्याप्त है। कैल्शियम को छोड़कर अन्य सभी आवश्यक तत्व—कैलोरी, प्रोटीन, लौह, फॉस्फोरस, विटामिन आदि—उनके भोजन में न्यूनतम स्तर से भी कम पाए जाते हैं। इस कारण वे शारीरिक वजन, स्वास्थ्य और कार्यक्षमता को संतुलित नहीं रख पाते। भविष्य की योजना बनाने या जीवन की गुणवत्ता सुधारने की क्षमता उनमें नहीं है क्योंकि वे न्यूनतम आवश्यक भोजन भी प्राप्त नहीं कर पाते। बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होता है, युवाओं में कमजोरी बढ़ती है और गर्भवती महिलाओं में कुपोषण के कारण उच्च मृत्यु दर देखी जाती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि बिरहोर जनजाति का जीवन आरंभ से ही अल्प पोषण और कुपोषण से ग्रसित होता है। गर्भावस्था से लेकर संपूर्ण जीवन तक वे अपूर्ण वृद्धि, नस्लीय दोष और शारीरिक दुर्बलता से जूझते रहते हैं।

रस्सी बनाने की परंपरा

बिरहोर समुदाय पेड़ों की छाल से रस्सी बनाने में अत्यंत दक्ष है। यही उनका प्रमुख व्यवसाय और जीविका का साधन है। छाल को वे चोप’ कहते हैं और इसी कारण उन्हें चोपदार भी कहा जाता है। इस कार्य में पुरुषों के साथ-साथ महिलाएँ और बच्चे भी सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।

बिरहोर द्वारा निर्मित रस्सियाँ मजबूत और सस्ती होती हैं, जिनकी मांग स्थानीय स्तर पर ही नहीं बल्कि देश और विदेश तक रहती है। यह कला उनके लिए कोई नई नहीं है, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही विरासत है। मानवशास्त्रियों के अनुसार, जैसे प्राचीन मानव अपने अनुभव और कौशल संतान को सौंपता था, वैसे ही बिरहोरों ने रस्सी बनाने की कला को वंश परंपरा से आगे बढ़ाया है।

उपयोग किए जाने वाले पेड़ और सामग्री

रस्सी बनाने के लिए वे मोहलाइन, सिसित, उदल, चिहुत, तलहेच, लपरासी, बेरी, डोडोखसका, हेसा आदि पेड़ों की छाल का प्रयोग करते हैं। इनमें मोहलाइन से बनी रस्सियाँ सबसे अधिक मजबूत और टिकाऊ होती हैं। शिकार के लिए बनाए जाने वाले जाल भी प्रायः मोहलाइन से ही तैयार किए जाते हैं। बेरी के रेशे से वे कुल्हई झाली (जालीदार थैला) बनाते हैं।

रस्सियों के प्रकारों में उमइन (पतली), बरही (मोटी) और बरहा (सबसे मोटी) प्रमुख हैं। इसके अलावा वे घरेलू और कृषि उपयोग की वस्तुएँ भी बनाते हैं—जैसे सिखइर, सिक्का, जोरी, जोती, दोगाही, दोमा, तघल, गुरमाहा, खइटजोर, पोरथन, डोइर आदि। महिलाएँ इन्हें आस-पास के गाँवों में बेचती हैं और बदले में धान, मकई, बाजरा या पैसे प्राप्त करती हैं।

रस्सी बनाने की प्रक्रिया

रस्सी तैयार करना कठिन और समयसाध्य कार्य है। कभी-कभी इसे पूरा करने में 2–3 दिन भी लग जाते हैं।

  • सबसे पहले छाल को पानी से भिगोकर मुलायम किया जाता है।
  • फिर उसे पतले रेशों में विभक्त किया जाता है।
  • इन रेशों को ऐंठकर लच्छा’ बनाया जाता है।
  • लच्छे को हाथ से ऐंठकर लंबा गुच्छा तैयार किया जाता है जिसे चरही’ कहते हैं।
  • चरही को लकड़ी से रगड़कर तीन बार ऐंठा जाता है और अंततः रस्सी तैयार होती है।
  • मोटाई के अनुसार रस्सी का नाम रखा जाता है—उमइन, बरही, बरहा।
  • चमक और सफाई के लिए रस्सी को हनीय’ नामक उपकरण से रगड़ा जाता है।

शिकार के लिए जाल

बिरहोर केवल रस्सी ही नहीं, बल्कि उससे बने विभिन्न प्रकार के जाल भी तैयार करते हैं।

  • खिमिया → खरगोश पकड़ने के लिए।
  • तितिर पोसी → छोटी चिड़ियों के लिए।
  • तुल झाली → गिलहरी पकड़ने के लिए।

ये जाल उनकी कुशलता और परंपरागत ज्ञान का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

वर्तमान चुनौतियाँ

बिरहोर और जंगल का संबंध सहजीवी है, लेकिन जंगल की अंधाधुंध कटाई ने उनके जीवन को प्रभावित किया है। चोप प्राप्त करने के लिए उन्हें दूर-दूर तक जाना पड़ता है और अक्सर आवश्यक सामग्री नहीं मिल पाती। ग्रामीण लोग इसका फायदा उठाकर उन्हें सन या नायलॉन देते हैं और बदले में बहुत कम मजदूरी चुकाते हैं। इससे उनकी पारंपरिक कला और आर्थिक स्थिति दोनों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

बिरहोर जनजाति की धार्मिक प्रणाली

बिरहोर समुदाय का जीवन धार्मिक विश्वासों और अनुष्ठानों से गहराई से जुड़ा हुआ है। उनके हर कार्य की शुरुआत किसी न किसी धार्मिक क्रिया या जादू-टोना से होती है ताकि आसपास के भूत-प्रेत प्रसन्न रहें और कोई हानि न पहुँचाएँ।

प्रमुख देवता और मान्यताएँ

  • मारांग बुरू → इसका अर्थ है बड़ा पहाड़। बिरहोर मानते हैं कि पहाड़ उनके जीवन का सबसे बड़ा सहायक है क्योंकि वहाँ उन्हें शिकार योग्य पशु, कंद-मूल, फल-फूल और आश्रय मिलता है।
  • सिंगबोंगा → यह सूर्य देवता है और बिरहोर का सर्वोच्च देवता माना जाता है। इसे सृष्टि का निर्माता और मानव का रक्षक समझा जाता है। यह भूत-प्रेतों की बुराई से बचाता है और अच्छे आचरण पर निगाह रखता है।
  • देवी माई और बुढ़ी माई → देवी माई को धन, स्वास्थ्य और संतान देने वाली शक्ति माना जाता है। इसका प्रतीक सिन्दूर से पुता हुआ लकड़ी का कुन्दा होता है।
  • ओरा बोंगा → यह कुल समूह का देवता है और परिवार के वरिष्ठ सदस्य के पास रहता है। इसके नाराज़ होने पर परिवार का कोई सदस्य बीमार पड़ सकता है।
  • हपरम → यह पितृ देवता हैं। झोपड़ी के किनारे इनके लिए स्थान निर्धारित किया जाता है। कहीं-कहीं इन्हें चौरासी हपरम भी कहा जाता है क्योंकि इसमें उन सभी पितृ आत्माओं को शामिल किया जाता है जिनके नाम ज्ञात नहीं होते।

भूत-प्रेत और अन्य शक्तियाँ

बिरहोर की मान्यताओं में अनेक भूत-प्रेत भी शामिल हैं।

  • सितोंग बोंगा, रंगारी भूत, कलुगु बोंगा, सिधाबारा भूत, भोक्ता और कोप्ता भूत → ये प्रमुख आत्माएँ हैं जिनकी पूजा समय-समय पर करनी पड़ती है।
  • हानिकारक भूत → नजोम, कुरीन, दरहा, भगत आदि। यदि इनकी आराधना न की जाए तो ये परेशानियाँ उत्पन्न करते हैं।

धार्मिक नेतृत्व

  • धार्मिक कार्यों का संचालन नाया करता है।
  • नाया की अनुपस्थिति में सोखा यह कार्य करता है। सोखा का मुख्य कार्य जड़ी-बूटियों से रोगों का उपचार करना होता है।

त्योहार

हालाँकि बिरहोर की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर है और उन्हें भोजन के लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ता है, फिर भी वे कुछ प्रमुख त्योहार मनाते हैं।

  • सरहुल
  • करमा
  • सोहराई
  • सोसो बोंगा
  • नावाजाम

इन त्योहारों में सामूहिक नृत्य और गीत-गान होता है। प्रत्येक पर्व के लिए अलग-अलग गीत गाए जाते हैं और समुदाय मिलकर उत्साहपूर्वक भाग लेता है।

बिरहोर जनजाति (Birhor tribe)  की राजनैतिक प्रणाली और जीवनचक्र

राजनैतिक प्रणाली

बिरहोर समाज की राजनीतिक व्यवस्था बहुत साधारण और निम्न स्तर की होती है।

  • वे जहाँ भी रहते हैं, प्रायः एक ही कुल समूह के होते हैं, इसलिए उनमें झगड़े और तनाव कम होते हैं।
  • नेतृत्व किसी प्रभावशाली व्यक्ति को दिया जाता है, जो उम्र, अनुभव, व्यवहारिकता और सूझ-बूझ के आधार पर चुना जाता है।
  • नेता का कार्य सीमित होता है—मुख्यतः एक टंडा के लोगों को दूसरे टंडा से जोड़ना और विवाह जैसे सामाजिक अवसरों में सहयोग देना।
  • इस प्रकार उनकी राजनीतिक प्रणाली सामुदायिक सहयोग और सरल नेतृत्व पर आधारित है।

जीवनचक्र

बिरहोर समुदाय जीवन को विभिन्न अवस्थाओं में विभाजित मानता है—शैशवकाल, बचपन, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था, जिसके बाद मृत्यु होती है।

  • गर्भावस्था: शिशु की रक्षा के लिए भूत-प्रेत और डाइन से बचाने हेतु उपाय किए जाते हैं। गर्भवती महिलाओं को कई निषेधों का पालन करना पड़ता है।
  • जन्म और बाल्यकाल: जन्म के सातवें दिन थाची (छठ्ठी) और नामकरण संस्कार होता है।
  • किशोरावस्था और विवाह: बच्चा बड़ा होने पर उसकी शादी कर दी जाती है। विवाह के बाद वह समाज का उत्तरदायी सदस्य बन जाता है और आजीविका की चिंता बढ़ जाती है।
  • युवावस्था और प्रौढ़ावस्था: धीरे-धीरे समय बीतता है, जवानी ढलती है और प्रौढ़ावस्था आती है।
  • वृद्धावस्था: बुजुर्ग लोग स्वस्थ रहने के लिए सोखा से झाड़-फूंक करवाते रहते हैं।
  • मृत्यु और अंतिम संस्कार: मृत्यु के बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार किया जाता है।

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