भारतीय सभ्यता के इतिहास में असुर जनजाति का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह जनजाति न केवल बिहार और झारखण्ड की आदिम परंपराओं का जीवंत प्रतीक है, बल्कि वैदिक साहित्य में भी इसका उल्लेख देवत्व के पर्याय के रूप में मिलता है। समय के साथ आर्यों की राजनीति और कूटनीति ने इस शब्द को ‘दानव’ और ‘राक्षस’ का पर्याय बना दिया, किंतु वस्तुतः असुर एक शक्तिशाली और साहसी समुदाय था जिसने मानव सभ्यता को लौह युग में प्रवेश दिलाया।असुरों को लौह-धातु गलाने और लोहे के औजार बनाने की कला में दक्ष माना जाता है। यही कारण है कि इन्हें लोहे का आविष्कार करने वाली जनजाति कहा जाता है। उनके द्वारा विकसित लौह-तकनीक ने कृषि, शिकार, युद्ध और निर्माण कार्यों में क्रांतिकारी परिवर्तन किया। लोहे के औजारों ने खेती को अधिक उत्पादक बनाया, हथियारों ने समुदायों को सुरक्षित और शक्तिशाली किया, और निर्माण कार्यों ने सामाजिक विकास को नई दिशा दी। इस प्रकार असुरों की लौह-कला ने मानव सभ्यता के वास्तविक उदय की नींव रखी।नेतरहाट के दुर्गम पठारी क्षेत्रों में बसे असुर गाँव आज भी इस बात के साक्षी हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी यह जनजाति अपनी संस्कृति और परंपरा को जीवित रखे हुए है। जंगलों के प्रहरी और प्रकृति के संरक्षक के रूप में असुरों ने सदियों से अपनी पहचान बनाई है। इतिहासकारों के अनुसार असुर कभी अत्यंत बलवान और साहसी थे। आर्यों के साथ उनका संघर्ष कई शताब्दियों तक चला। जब बल प्रयोग से उन्हें पराजित करना संभव न हुआ, तब छल और कूटनीति का सहारा लिया गया। इस प्रक्रिया में उनकी छवि को विकृत कर उन्हें ‘राक्षस’ और ‘दानव’ कहा जाने लगा। किंतु वास्तविकता यह है कि असुर जनजाति ने मानव सभ्यता को लौह युग में प्रवेश दिलाकर इतिहास में अमिट छाप छोड़ी।
नेतरहाट का पठारी संसार
असुर मुख्यतः नेतरहाट के दुर्गम पठारी क्षेत्र में निवास करते हैं। छोटानागपुर के उत्तर-पश्चिमी कोनों में फैला यह पठार लगभग 600 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है। इसकी ऊँचाई लगभग 1200 मीटर है, जहाँ पहुँचना सामान्य जन के लिए कठिन माना जाता है। पठार की समतल चोटियों को स्थानीय लोग ‘पाट’ कहते हैं। इन्हीं पाटों पर बसे असुर गाँव भी पाट नाम से ही जाने जाते हैं— जैसे जोभी पाट, डुमर पाट, नरमा पाट, लोघा पाट, सखुआपानी आदि। विशेष बात यह है कि यह वही क्षेत्र है जहाँ बॉक्साइड लौह-अयस्क के प्रचुर भंडार पाए जाते हैं। असुर जनजाति ने इन प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर लोहे को गलाने और औजार बनाने की कला विकसित की। यही कारण है कि असुरों को लौह-युग का प्रवर्तक माना जाता है। उनके निवास-स्थल और लौह-अयस्क की प्रचुरता के बीच का यह संबंध मानव सभ्यता के विकास की दिशा तय करने वाला रहा है।
जनसंख्या और विस्तार
असुर जनजाति की जनसंख्या : मौलिक एवं साहित्यिक रूपांतरण
1991 की जनगणना के अनुसार बिहार और झारखण्ड में असुरों की कुल संख्या लगभग 7,783 थी।
- गुमला जिले के बिशुनपुर, चैनपुर, घाघरा और डुमरी क्षेत्रों में इनकी बड़ी आबादी पाई जाती है।
- लोहरदगा जिले के किस्को और सेन्हा में भी इनकी उपस्थिति उल्लेखनीय है।
- लातेहार जिले के कुछ गाँवों में भी असुर समुदाय निवास करता है।
इन क्षेत्रों में असुर जनसंख्या का अनुपात लगभग 94% तक पहुँचता है। मध्य प्रदेश में इनकी संख्या लगभग 250 बताई जाती है। जंगल के अच्छे संरक्षक होने के कारण इन्हें चाय बागानों की देखभाल हेतु जलपाईगुड़ी, सिक्किम, भूटान, आसाम और अंडमान द्वीप समूह तक ले जाया गया।
असुर जनजाति : 2011 की जनगणना
2011 की जनगणना में असुर जनजाति की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
- झारखण्ड में इनकी कुल संख्या लगभग 22,459 रही।
- पूरे भारत में असुरों की जनसंख्या लगभग 33,000 आंकी गई।
- बिहार में इनकी संख्या लगभग 4,987 दर्ज की गई।
वर्तमान अनुमानित जनसंख्या
आज (2024–25) असुर जनजाति की अनुमानित जनसंख्या लगभग 35,000–37,000 मानी जाती है। भारत सरकार ने असुरों को विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूह (PVTG) की सूची में शामिल किया है। यह दर्जा इस बात का प्रमाण है कि असुर जनजाति अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं के साथ आज भी जीवित है, किंतु संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता है।
वैदिक साहित्य में असुर
इतिहासकार बनर्जी और शास्त्री (1926) के अनुसार असुर एक शक्तिशाली समुदाय था, जिसे वैदिक आर्य भी सम्मान देते थे। किंतु समय के साथ आर्यों ने छल और कूटनीति का सहारा लेकर असुरों को पराजित करने का प्रयास किया।
- असुरों और आर्यों के बीच संघर्ष कई शताब्दियों तक चला।
- जो असुर आर्यों की दासता स्वीकार नहीं करते थे, उन्हें राक्षस, दानव और असुर जैसे अपमानजनक नामों से पुकारा गया।
- मजुमदार (1927) ने भी उल्लेख किया है कि असुर आर्यों के समय अत्यंत बलवान और साहसी थे। जब आर्य बल प्रयोग से उन्हें परास्त न कर सके, तब उन्होंने कूटनीति और छल का सहारा लिया और धीरे-धीरे उनके वंशजों का सफाया कर दिया।
- ऋग्वेद में “असुर” शब्द का प्रयोग कई बार हुआ है।
- शोधकर्ताओं के अनुसार, लगभग 90 बार यह शब्द सकारात्मक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है।
- “असु” का अर्थ है प्राण या जीवन शक्ति, और “अर” का अर्थ है धारक। इस प्रकार असुर का मूल अर्थ हुआ – जीवन शक्ति का धारक।
- प्रारंभिक वैदिक देवताओं जैसे इंद्र, वरुण और मित्र को भी असुर कहा गया है।
असुर जनजाति से जुडी वैदिक युग की घटनाएँ और कथाएँ
1. वृत्रासुर और जल का संघर्ष
कथा: वृत्रासुर ने नदियों का प्रवाह रोक दिया था। इंद्र ने वज्र से उसका वध कर जल को मुक्त किया। जनजातीय संदर्भ: झारखण्ड की असुर जनजाति लौह-गलन की कला में दक्ष रही है। जल और अग्नि उनके जीवन और आजीविका के मूल तत्व हैं। वैदिक वृत्रासुर जल पर नियंत्रण का प्रतीक था, और आज की असुर जनजाति भी जल, वन और अयस्क जैसे प्राकृतिक संसाधनों से गहरे जुड़ी हुई है।
2. महाबली और वामन अवतार
कथा: महाबली न्यायप्रिय और दानशील था, किंतु छल से वामन अवतार द्वारा पराजित किया गया। जनजातीय संदर्भ: असुर जनजाति भी सामुदायिक जीवन में दानशीलता और न्यायप्रियता को महत्व देती है। पंचायत और सामूहिक भोज जैसी परंपराएँ इसी उदारता की झलक देती हैं। महाबली की तरह असुर जनजाति भी अपनी उदारता और सामूहिकता के लिए जानी जाती है, किंतु आधुनिक औद्योगीकरण और खनन ने उन्हें छल और विस्थापन का सामना कराया।
3. हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद
कथा: हिरण्यकशिपु को दानव कहा गया, जबकि उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु का भक्त था। जनजातीय संदर्भ: असुर जनजाति को भी इतिहास और साहित्य में अक्सर नकारात्मक रूप से चित्रित किया गया, जबकि उनके भीतर धर्म, भक्ति और प्रकृति-प्रेम की गहरी भावना रही है। जैसे प्रह्लाद ने विष्णु-भक्ति से अपने पिता के अहंकार को चुनौती दी, वैसे ही आज की असुर जनजाति अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं से आधुनिकता के दबाव को चुनौती देती है।
असुर जनजाति का जाति विज्ञान
ऐतिहासिक साक्ष्य: असुर जनजाति का उल्लेख बौद्ध साहित्य (1926) में एक आदिवासी जनजाति के रूप में किया गया है। एक शिलालेखीय साक्ष्य भी इनके अस्तित्व की पुष्टि करता है।
आधुनिक दृष्टिकोण
रूबेन (1939), एलबीन (1942), हट्टन (1961), गेट्स (1969), थापर (1972), गुप्ता (1976) जैसे विद्वानों का मानना है कि असुर सिंधु सभ्यता के निर्माता थे। परंतु यह रहस्य अब भी अनसुलझा है कि वे कब और कैसे शिकारी जीवन की ओर लौटे।
प्रजाति और भाषा
मार्टिन पद्धति के अनुसार असुरों का कद छोटा, सिर लंबा, नाक मध्यम और चेहरा लेप्टोप्रोसोपिक होता है। रक्त वर्ग में B और O की प्रधानता है। इन्हें प्रोटो-ऑस्ट्रेलाइड जाति में रखा गया है। इनकी भाषा असुरी है, जो मुण्डारी की 14 उपबोलियों में से एक है और भारतीय भाषायी सर्वेक्षण (1906) में दर्ज है।
गांव और जीवनशैली
असुर गांवों की रचना सहज होती है, परंतु घर हमेशा गितिओरा (पूजा स्थल) और नृत्य अखाड़ा के पास बनाए जाते हैं। मिट्टी की दीवारें, लकड़ी के खंभे और खपड़ों की छतें इनके घरों की पहचान हैं। खपड़ों का निर्माण वे स्वयं करते हैं और लकड़ियों को बाँधने के लिए मोहलाइन के रेशों का प्रयोग करते हैं।
असुर जनजाति: जीवन, संस्कृति और परम्परा
परिवार व्यवस्था
असुर समाज में पिता परिवार का मुखिया होता है।
- एकल परिवार: माता-पिता और उनके अविवाहित बच्चे।
- विस्तृत परिवार: माता-पिता, विवाहित-अविवाहित बच्चे, और पिता के भाई-बहन भी साथ रहते हैं।
- मिश्रित परिवार: विधवा या विधुर माता-पिता अपने पहले विवाह से हुए बच्चों के साथ रहते हैं।
सम्पत्ति का बंटवारा भाईयों में होता है, कभी-कभी बड़े बेटे को अधिक हिस्सा मिल जाता है।
सामाजिक संस्था और प्रशिक्षण
गांव का अखाड़ा युवाओं को नियंत्रित और प्रशिक्षित करता है।
- लड़कियाँ घरेलू कार्य और नृत्य में दक्ष बनती हैं।
- लड़के कृषि, मकान निर्माण, शिकार और औजार बनाने में निपुण होते हैं।
- अखाड़ा उन्हें कुशल खिलाड़ी और समाज के योग्य सदस्य बनाने का माध्यम है।
विवाह परम्परा
विवाह असुर समाज की निरंतरता का आधार है।
- वधू मूल्य: एक सुअर, नगद धन और कपड़े।
- यदि वर पक्ष तुरंत वधू मूल्य न दे सके तो समय दिया जाता है।
- शादी से पहले लड़का-लड़की मिलने के लिए स्वतंत्र होते हैं।
- कई बार शादी से पहले ही वे माता-पिता बन जाते हैं और बाद में विवाह सम्पन्न होता है।
‘इदि में’ प्रथा: बिना विवाह हुए पति-पत्नी के रूप में रहने की अनुमति। कई बार माता-पिता और उनके बच्चे एक साथ वैवाहिक उत्सव मनाते हैं।
पत्नी को समाज में विशेष महत्व दिया जाता है। पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी पत्नी नहीं लाई जाती। बांझपन की स्थिति में पत्नी की अनुमति से दूसरा विवाह होता है। तलाक की परम्परा नहीं है।
असुर जनजाति के विवाह के प्रकार:
- सेवा विवाह
- भगाने वाला विवाह
- बलपूर्वक विवाह
- घर जमाई विवाह
- गोलट (बहनों का आदान-प्रदान) विवाह पति या पत्नी की मृत्यु पर देवर या ननद से विवाह की परम्परा भी है।
असुर जनजाति के दाह संस्कार
असुर समाज में मृतकों को प्रायः जलाया जाता है, कभी-कभी बूढ़ों को दफनाया भी जाता है।
- मृतक के कपड़े भी साथ जलाए जाते हैं।
- दाह संस्कार के बाद स्नान किया जाता है।
- आठ दिन या दो सप्ताह बाद मृतक की स्मृति में भोज होता है।असुर जनजाति के
आर्थिक जीवन
असुरों का परम्परागत पेशा लोहा गलाना है।
- उन्होंने मैगनेटाइट (पोला), हेमेटाइट (बिची), और लेटेराइट से प्राप्त हेमेटाइट (गोटा) की पहचान की।
- साल की लकड़ी से कोयला बनाकर लोहा गलाते थे।
- जंगल काटकर खेती करते थे, पर भूमि अपरदन और वर्षा पर निर्भरता के कारण स्थायी आर्थिक तंगी में रहते हैं।
धार्मिक जीवन और त्योहार
असुर अपने को जंगल का आदमी और आदि भूमि-पुत्र कहते हैं।
- इनके देवता बोंगा जंगलों में रहते हैं।
- सिंगबोंगा सबसे प्रमुख देवता हैं।
- सरना में इनके भूत और जगत्माएँ रहते हैं जो फसलों की रक्षा करते हैं।
असुर जनजाति के मुख्य त्योहार:
- सरहुल
- सोहराइ
- नावाखनी
- काढडेली
- संडसी-कुटासी
संडसी-कुटासी पर्व:
- ‘भांथी’ की पूजा होती है।
- लाल मुर्गा और मुर्गी की बलि दी जाती है।
- बलि स्वीकार होने का संकेत चावल के दाने चुगने से मिलता है।
- इसके बाद भोज और नृत्य होता है।
- विशेषता यह है कि इस नृत्य में सामान्य वाद्ययंत्रों का प्रयोग नहीं होता।
विश्वास और उपचार
असुर समाज में डायन-भूत पर गहरा विश्वास है।
- संकट की घड़ी में वे सोखा, मति और ओझा से संपर्क करते हैं।
- बीमारियों का कारण देवी-देवताओं का अपमान या अदृश्य शक्तियों का प्रकोप माना जाता है।
- उपचार के लिए वे अपनी पारंपरिक जड़ी-बूटी चिकित्सा का सहारा लेते हैं।
प्रथा और कानून व्यवस्था
असुर समाज अपनी परम्परागत प्रथाओं से नियंत्रित होता है।
- पंचायत ही मुख्य संस्था है।
- इसके सदस्य होते हैं—महतो, बैगा, पूजा, गोरइत।
- पंचायत में हर पुरुष सदस्य अपनी बात रख सकता है।
- विवाद होने पर अखाड़ा में सबको बुलाकर गवाहों के सामने तर्क-वितर्क होता है और फिर निर्णय दिया जाता है।
- निर्णय का पालन अनिवार्य है, अन्यथा व्यक्ति को गांव छोड़ना पड़ता है।
- दंड प्रायः आर्थिक होता है।
धर्म परिवर्तन
पिछले कुछ दशकों में कई असुर परिवारों ने ईसाई धर्म स्वीकार किया है।
- उनकी समस्याओं का समाधान अब पादरी या फादर करते हैं।
- फादर समुदाय के बुजुर्गों से विचार-विमर्श कर निर्णय लेते हैं।
वर्तमान स्वरूप
आज असुर जनजाति मुख्यतः कृषक बन चुकी है।
- जंगल नीति के कारण उनका परम्परागत पेशा—लोहा गलाना—लगभग समाप्त हो गया है।
- शिकार और जंगल से फल-फूल, कंद-मूल इकट्ठा करना जारी है, पर यह गौण हो गया है।
- खेती ही अब उनका प्रमुख जीवन-आधार है।
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