संथाली लोक कथा जभी बयार, तभी जाड़ा | ठंड का फैसला : झारखण्ड के घने सारंडा जंगल की पृष्ठभूमि में यह कहानी दो विपरीत स्वभाव वाले जीवों—बाघ और भालू—की अनोखी मित्रता को प्रस्तुत करती है। बाघ अपनी तेज़ी और शिकार की निपुणता के लिए जाना जाता है, जबकि भालू अपनी भारी-भरकम काया, धैर्य और शांत स्वभाव के लिए। दोनों की दोस्ती जंगल के अन्य जीवों के लिए आश्चर्य का विषय थी, क्योंकि स्वभाव में इतना अंतर होने के बावजूद वे एक-दूसरे के साथ रहते, घूमते और जीवन के अनुभव साझा करते थे।यह कथा केवल मित्रता की मिसाल नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि अलग-अलग दृष्टिकोण और अनुभव कैसे विवाद का कारण बन सकते हैं। ठंड के मौसम पर बाघ और भालू की बहस इस बात का प्रतीक है कि हर जीव अपनी परिस्थितियों और शारीरिक संरचना के आधार पर दुनिया को अलग तरह से महसूस करता है। सियार का आगमन इस कहानी का मोड़ है, जहाँ बुद्धिमत्ता और चतुराई जीवन बचाने का साधन बन जाती है। इस प्रकार, यह कथा मित्रता, मतभेद, विवाद और बुद्धि के महत्व को उजागर करती है।
झारखण्ड के घने सारंडा जंगल में एक बाघ और एक भालू रहते थे। दोनों अलग-अलग स्वभाव के जीव थे, परंतु उनमें गहरी मित्रता थी। बाघ तेज, चुस्त और शिकार में निपुण था, जबकि भालू भारी-भरकम, शांत और धैर्यवान। दोनों की दोस्ती पूरे जंगल में मशहूर थी।
यह कहानी ‘Santhali lok katha thanth ka faisala’ के माध्यम से हमें सिखाती है कि विपरीत स्वभाव वाले जीव भी एक साथ रह सकते हैं और जीवन को साझा कर सकते हैं। यह कथा हमें यह भी दिखाती है कि विभिन्न दृष्टिकोण कैसे संघर्ष पैदा कर सकते हैं।
This story titled ‘Santhali lok katha thanth ka faisala’ teaches us that opposites can coexist and share life.
इस कहानी का शीर्षक है ‘Santhali lok katha thanth ka faisala’ जो मित्रता, मतभेद, और विवाद के मुद्दों को उजागर करता है। यह कथा हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं के बारे में सोचने पर मजबूर करती है, खासकर सामाजिक संबंधों में संघर्ष के संदर्भ में।
वे अक्सर साथ-साथ घूमते, भोजन की तलाश करते और जीवन के अनुभव साझा करते। जंगल के अन्य जीव भी उनकी मित्रता को देखकर हैरान होते कि इतने अलग स्वभाव वाले दो जीव इतने अच्छे दोस्त कैसे हो सकते हैं।
ठंड के मौसम की शुरुआत
एक दिन ठंड का मौसम था। हवा में सिहरन थी, पेड़ों की पत्तियाँ ठंडी बयार से काँप रही थीं। बाघ और भालू एक बड़े साल के पेड़ के नीचे बैठे थे। दोनों अपने-अपने अनुभव साझा कर रहे थे।
बाघ ने अपनी पूँछ हिलाते हुए कहा— “मित्र, जाड़े के दिनों में ठंड बहुत लगती है। शरीर जैसे जम-सा जाता है। शिकार पर निकलना भी कठिन हो जाता है।”
भालू ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया— “नहीं भाई, मुझे तो बरसात के दिनों में ठंड ज्यादा लगती है। जब बाल भीग जाते हैं, तो शरीर काँपने लगता है। जाड़े में तो मेरे लंबे बाल मुझे ढक लेते हैं और मुझे ठंड उतनी नहीं सताती।”
बाघ ने सिर हिलाकर कहा— “तुम गलत कह रहे हो। जाड़े की ठंड ही सबसे कठोर होती है। बरसात में तो थोड़ी देर की ठंड होती है, लेकिन जाड़े में तो हर पल शरीर काँपता रहता है।”
भालू भी अपनी बात पर अड़ा रहा— “नहीं, बरसात की ठंड ही सबसे कठिन होती है। पानी से भीगे बाल जब शरीर से चिपक जाते हैं, तो लगता है जैसे हड्डियाँ तक ठंडी हो गई हों।”
विवाद का बढ़ना
दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े रहे। बहस धीरे-धीरे विवाद में बदल गई। बाघ अपनी तेज आवाज़ में बार-बार अपनी बात दोहराता, तो भालू अपनी भारी आवाज़ में उसे काट देता। जंगल की शांति उनकी बहस से भंग हो गई।
असल में दोनों की बातें अपनी-अपनी जगह सही थीं। भालू के लंबे बाल उसे जाड़े में बचा लेते थे, लेकिन बरसात में वही बाल उसके लिए परेशानी बन जाते थे। दूसरी ओर, बाघ के छोटे बाल जाड़े में उसे ठंड से बचा नहीं पाते, पर बरसात में जल्दी सूख जाते थे।
सियार का आगमन
बहस बढ़ती ही जा रही थी। तभी दूर से एक सियार आता दिखाई दिया। वह चालाक और चतुर जीव था। जंगल में उसकी पहचान ही उसकी बुद्धि थी। बाघ और भालू ने सोचा कि क्यों न इस विवाद का फैसला उसी से कराया जाए।
बाघ ने आवाज़ लगाई— “अरे भांजे! इधर आओ। हमारे बीच एक विवाद चल रहा है। तुम ही इसका फैसला करो।”
सियार पास आया और बोला— “क्या बात है मामा जी? किस बात पर विवाद हो रहा है?”
भालू ने कहा— “हम दोनों में यह बहस हो रही है कि ठंड जाड़े में ज्यादा लगती है या बरसात में। बाघ कहता है जाड़े में ठंड ज्यादा होती है, और मैं कहता हूँ बरसात में।”
सियार ने थोड़ी देर सोचा और बोला— “ठीक है, लेकिन पहले मुझे विस्तार से बताओ कि तुम दोनों का अनुभव क्या है।”
बाघ ने कहा— “जाड़े में ठंड इतनी लगती है कि शरीर जम जाता है। शिकार करना कठिन हो जाता है। बरसात में तो थोड़ी देर की ठंड होती है, लेकिन जाड़े की ठंड असहनीय होती है।”
भालू ने कहा— “बरसात में जब बाल भीग जाते हैं, तो ठंड हड्डियों तक उतर जाती है। जाड़े में मेरे बाल मुझे बचा लेते हैं। इसलिए बरसात की ठंड ही सबसे कठिन होती है।”
धमकी और संकट
सियार ने दोनों की बातें ध्यान से सुनीं। तभी बाघ ने गरजते हुए कहा— “सुन लो भांजे, अगर तुमने भालू की बात सही बताई तो मैं तुम्हें मारकर खा जाऊँगा।”
भालू भी पीछे नहीं रहा। उसने कहा— “और अगर तुमने बाघ की बात सही बताई तो मैं तुम्हें मार डालूँगा।”
सियार के माथे पर पसीना आ गया। उसने सोचा— “यह तो बड़ी मुसीबत है। किसी भी पक्ष में जाने से मेरी जान जाएगी। अगर बाघ का पक्ष लूँ तो भालू मुझे मार देगा, और अगर भालू का पक्ष लूँ तो बाघ मुझे खा जाएगा।”
सियार की चतुराई
सियार थोड़ी देर चुप रहा। उसने अपनी बुद्धि दौड़ाई और एक युक्ति सूझी। उसने मुस्कराते हुए कहा— “मामा जी, मैंने आप दोनों की बातें ध्यान से सुनीं। मेरा फैसला यह है कि ठंड न तो सिर्फ जाड़े में ज्यादा लगती है और न ही बरसात में। असली ठंड तो तब लगती है जब हवा चलती है। हवा ही ठंड को बढ़ा देती है।”
बाघ और भालू दोनों चकित रह गए। वे सोच रहे थे कि सियार किसी एक का पक्ष लेगा और फिर वे उसे मार डालेंगे। लेकिन सियार ने अपनी चतुराई से दोनों के जाल से बच निकला।
परिणाम
बाघ और भालू दोनों पछताते रह गए। उन्हें लगा कि उन्होंने सियार को फँसाने की कोशिश की थी, लेकिन वह अपनी बुद्धि से बच निकला। सियार वहाँ से तुरंत चला गया और मन-ही-मन खुश हुआ— “जान बची तो लाखों पाए।”
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