खोरठा भाषा साहित्य की परंपरा लोकगीतों, लोककथाओं और मौखिक परंपराओं से प्रारंभ होकर आधुनिक शिष्ट साहित्य तक विस्तृत है। इस साहित्यिक यात्रा में अनेक कवि और साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं से भाषा को गौरव प्रदान किया। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब खोरठा साहित्य आधुनिक चेतना के साथ उभर रहा था, उस समय शिवनाथ प्रमाणिक का काव्य साहित्य एक सशक्त हस्ताक्षर के रूप में सामने आया। उनकी रचनाएँ खोरठा पद्य साहित्य की प्रकाशित कृतियों में विशिष्ट स्थान रखती हैं।
खोरठा पद्य साहित्य में शिवनाथ प्रमाणिक का स्थान
शिवनाथ प्रमाणिक को खोरठा पद्य साहित्य का आधुनिक युग का प्रवर्तक माना जाता है। उनकी कविताएँ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना की वाहक भी हैं। उन्होंने खोरठा भाषा को लोकजीवन की सहजता से जोड़ते हुए उसे साहित्यिक गरिमा प्रदान की।
- उनकी कविताओं में ग्रामीण जीवन, प्रकृति, श्रमशीलता और सामाजिक न्याय की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है।
- उन्होंने खोरठा साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहने दिया, बल्कि उसे **सामाजिक परिवर्तन का माध्यम** बनाया।
- -उनकी रचनाएँ खोरठा साहित्य को अकादमिक और आलोचनात्मक अध्ययन के योग्य बनाती हैं।
काव्य की विचारधारा
शिवनाथ प्रमाणिक की काव्य-विचारधारा मानववादी और यथार्थवादी है।
- वे लोकजीवन की पीड़ा, संघर्ष और आशा को अपनी कविताओं में व्यक्त करते हैं।
- उनकी कविताओं में प्रकृति और संस्कृति का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
- वे मानते थे कि साहित्य का उद्देश्य केवल सौंदर्यबोध नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना भी है।
- उनकी विचारधारा में समानता, न्याय और सांस्कृतिक अस्मिता की चेतना प्रमुख है।
महाकाव्य का विश्लेषण
शिवनाथ प्रमाणिक ने खोरठा साहित्य में महाकाव्य की परंपरा को पुनर्जीवित किया।
- उनका महाकाव्य *मइछगंधा* खोरठा साहित्य की एक महत्वपूर्ण कृति है।
- इसमें **रस-व्यंजना, अलंकार-योजना, छंद-विधान और प्रतीक विधान** का संतुलित प्रयोग मिलता है।
- -महाकाव्य में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रसंगों को कलात्मक रूप दिया गया है।
- मइछगंधा में वीरता, करुणा और श्रृंगार रस का अद्भुत संयोजन है।
- यह महाकाव्य खोरठा साहित्य को उच्च कोटि की कलात्मकता प्रदान करता है और इसे भारतीय महाकाव्य परंपरा से जोड़ता है।
खंडकाव्य का विश्लेषण
शिवनाथ प्रमाणिक का दामोदर कोरां´ खंडकाव्य खोरठा साहित्य की एक विशिष्ट उपलब्धि है।
- इसमें सामाजिक प्रवृत्तियों और यथार्थ का चित्रण किया गया है।
- खंडकाव्य में लोकजीवन की समस्याएँ, संघर्ष और आशाएँ अभिव्यक्त होती हैं।
- इसमें छंद और अलंकार का प्रयोग सरल किन्तु प्रभावी है।
- दामोदर कोरां खंडकाव्य खोरठा साहित्य को सामाजिक यथार्थवाद की दिशा में अग्रसर करता है।
मुक्तकाव्य का विश्लेषण
शिवनाथ प्रमाणिक ने मुक्तकाव्य की परंपरा को भी समृद्ध किया।
- उनके मुक्तकाव्य संग्रह तातल और हेमाल खोरठा साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।
- मुक्तकाव्य में उन्होंने जीवन के विविध पक्षों का संक्षिप्त और प्रभावी प्रस्तुतीकरण किया।
- इन कविताओं में प्रकृति, प्रेम, करुणा, संघर्ष और आशा का चित्रण मिलता है।
- मुक्तकाव्य की भाषा सहज और भावपूर्ण है, जो पाठकों के हृदय को सीधे स्पर्श करती है।
- मुक्तकाव्य में उन्होंने लोकधुनों और गीतों की शैली का प्रयोग किया, जिससे उनकी कविताएँ जनजीवन से जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं।
साहित्यिक शैली और विशेषताएँ
- भाषा-शैली: सहज, ओजपूर्ण और लोकधर्मी।
- विषय-वस्तु: लोकजीवन, प्रकृति, सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक अस्मिता।
- काव्यगत विशेषताएँ: छंद, अलंकार और प्रतीक विधान का संतुलित प्रयोग।
- मानववादी दृष्टि: समाज के वंचित वर्गों और ग्रामीण जीवन की पीड़ा का मार्मिक चित्रण।
समग्र मूल्यांकन
- शिवनाथ प्रमाणिक का काव्य साहित्य खोरठा भाषा को आधुनिकता और परंपरा का संगम प्रदान करता है।
- उनकी रचनाएँ खोरठा साहित्य को अकादमिक और आलोचनात्मक अध्ययन के योग्य बनाती हैं।
- उन्होंने खोरठा भाषा को केवल बोली नहीं रहने दिया, बल्कि उसे साहित्यिक चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता की सशक्त अभिव्यक्ति बनाया।
- महाकाव्य, खंडकाव्य और मुक्तकाव्य में उनका योगदान खोरठा साहित्य को विविधता और गहराई प्रदान करता है।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि शिवनाथ प्रमाणिक का स्थान खोरठा पद्य साहित्य में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनकी काव्य-विचारधारा मानववादी और यथार्थवादी है, जो समाज को दिशा देती है। महाकाव्य मइछगंधा, खंडकाव्य दामोदर कोरां´ और मुक्तकाव्य तातल व हेमाल* खोरठा साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। उनका काव्य साहित्य खोरठा भाषा को आधुनिकता और परंपरा का संगम प्रदान करता है और इसे भारतीय साहित्य की मुख्यधारा से जोड़ता है।
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