(नागवंशी शासन व्यवस्था (Nagavanshi sashan ) : भारत का इतिहास केवल विशाल साम्राज्यों और प्रसिद्ध राजवंशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी गहराई में स्थानीय जनजातीय और क्षेत्रीय शासनों की भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन्हीं में से एक है झारखंड का छोटानागपुर क्षेत्र, जो अपनी विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक परंपराओं और सांस्कृतिक चेतना के कारण भारतीय इतिहास में अलग स्थान रखता है। यहाँ की शासन व्यवस्था ने न केवल स्थानीय समाज को संगठित किया, बल्कि लोकतांत्रिक परंपराओं की नींव भी रखी, जो आगे चलकर भारतीय जनजीवन का अभिन्न अंग बनी। मुंडा जनजाति की पड़हा पंचायत व्यवस्था से लेकर नागवंशी राजाओं की शासन प्रणाली तक की यात्रा इस क्षेत्र की राजनीतिक-सांस्कृतिक चेतना को उजागर करती है। नागवंशी शासन (Nagavanshi sashan ), जो झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में प्राचीन काल से स्थापित था, अपने प्रशासनिक ढाँचे में राजा, मानकी, पड़हा पंचायत और भुईहर जैसे पदों पर आधारित था। यह व्यवस्था स्थानीय समाज को संगठित रखने और न्याय-सुरक्षा प्रदान करने का माध्यम बनी। समय के साथ जब मुगलों और अंग्रेजों का हस्तक्षेप इस क्षेत्र में बढ़ा, तो पारंपरिक व्यवस्था में कर वसूली और जमींदारी प्रथा जुड़ गई। इससे धीरे-धीरे पुरानी पंचायत-आधारित प्रणाली कमजोर पड़ने लगी और सामुदायिक लोकतांत्रिक ढाँचे का स्वरूप बदल गया। फिर भी नागवंशी शासन (Nagavanshi sashan ) की ऐतिहासिक भूमिका इस बात में निहित है कि उसने जनजातीय परंपराओं और राजसत्ता को एक सूत्र में बाँधकर झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को स्थायित्व प्रदान किया ।झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में नागवंशी शासन एक प्राचीन राजव्यवस्था थी। इसका प्रशासनिक ढाँचा मुख्य रूप से राजा, मानकी, पड़हा पंचायत और भुईहर जैसे पदों पर आधारित था। समय के साथ मुगलों और अंग्रेजों के हस्तक्षेप से इसमें कर वसूली और जमींदारी प्रथा जुड़ गई, जिसके कारण पारंपरिक व्यवस्था धीरे-धीरे समाप्त हो गई।
नागवंशी शासन (Nagavanshi sashan) का उद्भव
नागवंशी शासन का उद्भव झारखंड की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। प्रथम शताब्दी, लगभग 64 ईस्वी में, मुंडा जनजाति की राजव्यवस्था नागवंशियों को हस्तांतरित हुई और इस प्रकार एक नए युग की शुरुआत हुई। नागवंशियों के प्रथम राजा फणिमुकुट राय थे, जिन्होंने सत्ता ग्रहण करने के बाद मुंडाओं की पड़हा पंचायत व्यवस्था को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसे और अधिक सुदृढ़ और विस्तृत बनाने का प्रयास किया। यह इस बात का प्रमाण है कि नागवंशी शासक स्थानीय परंपराओं और जनजीवन को सम्मान देते थे और शासन को जनसामान्य के निकट बनाए रखना चाहते थे।
प्रारंभिक काल में कर व्यवस्था, भूमि व्यवस्था और प्रशासनिक ढांचा लगभग उसी रूप में चलता रहा जैसा मुंडाओं के समय था। कर वसूली सामुदायिक सहमति से होती थी, भूमि का बंटवारा भी पंचायतों की देखरेख में होता था और सामाजिक-न्यायिक मामलों में पंचायतें ही प्रमुख भूमिका निभाती थीं। नागवंशियों ने शासन में कठोर परिवर्तन नहीं किए, बल्कि धीरे-धीरे सुधार और विस्तार की नीति अपनाई। इस कारण जनजातीय समाज में स्थिरता बनी रही और लोग नए शासकों को सहजता से स्वीकार कर पाए।
नागवंशी शासन ने स्थानीय परंपराओं को संरक्षित रखते हुए प्रशासनिक ढांचे को अधिक संगठित रूप दिया। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि झारखंड की सामाजिक संरचना में एक नए अध्याय की शुरुआत थी। नागवंशियों ने जनजातीय लोकतांत्रिक परंपराओं को राजसत्ता के साथ जोड़कर एक अनोखा मिश्रण प्रस्तुत किया और यही कारण है कि नागवंशी शासन को झारखंड के इतिहास में स्थायी और प्रभावशाली स्थान प्राप्त हुआ।
|
प्रारंभिक प्रशासनिक स्वरूप
- नागवंशी शासन ने मुंडाओं की परंपरागत व्यवस्था को अपनाया।
- गाँवों और पड़हा पंचायतों की भूमिका बनी रही।
- कर वसूली का कोई प्रावधान आम जनता से नहीं था।
- शासन का आधार सहयोग और सामूहिकता था।
- पहली शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी तक इस व्यवस्था में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ।
नागवंशी शासन का उद्भव
- नागवंशी राजवंश, जिसे खुखरा चिफ्टेनसी भी कहा जाता है, ने पहली शताब्दी से लेकर आधुनिक काल तक छोटानागपुर क्षेत्र पर शासन किया।
- इस वंश के संस्थापक राजा फणिमुकुट राय माने जाते हैं।
- प्रारंभिक काल में नागवंशी शासन ने मुंडा जनजाति की पड़हा पंचायत व्यवस्था को ही आधार बनाया और उसे आगे बढ़ाया।
प्रशासनिक तंत्र और पद
- राजा (नागवंशी शासक)
- शासन का सर्वोच्च पद राजा का था।
- राजा राज्य की रक्षा, न्याय और धार्मिक परंपराओं का पालन कराता था।
- प्रारंभ में राजा प्रजा से कर नहीं लेता था, बल्कि सहयोग और सामूहिकता पर शासन चलता था।
मानकी
- कई गाँवों को मिलाकर एक पट्टी बनती थी, जिसका प्रमुख मानकी कहलाता था।
- मानकी स्थानीय प्रशासन और कर व्यवस्था का संचालन करता था।
- मुगलों के दबाव में मानकी को बाद में भुईहर कहा जाने लगा और उसे मालगुजारी वसूलने का आदेश दिया गया।
पड़हा पंचायत (Padaha Panchayat)
- कई पट्टियों को मिलाकर पड़हा बनता था।
- इसका प्रमुख पड़हा राजा होता था।
- पड़हा पंचायत में पाँच अधिकारी होते थे:
- दीवान
- ठाकुर
- पांडे
- कर्ता
- लाल
- ये पद वंशानुगत थे और राजा को सलाह देने तथा प्रशासनिक कार्यों में सहयोग करते थे।
भुईहर और जागीरदार
- मुगलों के समय कर वसूली के लिए मानकी को भुईहर कहा गया।
- अंग्रेजों के समय राजा ने अलग-अलग जागीरदार नियुक्त किए, जो कर वसूलते थे।
- 1793 ई. में अंग्रेजों ने स्थायी बंदोबस्ती लागू कर दी और जागीरदारी को जमींदारी प्रथा में बदल दिया।
प्रशासनिक व्यवस्था की विशेषताएँ
- प्रारंभिक काल में यह व्यवस्था जनजातीय लोकतंत्र और सहकारिता पर आधारित थी।
- राजा का चुनाव होता था, वंशानुगत नहीं।
- कर वसूली का प्रावधान नहीं था, बाद में मुगलों और अंग्रेजों के दबाव में शुरू हुआ।
- पड़हा पंचायत न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका – तीनों भूमिकाएँ निभाती थी।
- अंग्रेजी शासन आने के बाद यह व्यवस्था समाप्त हो गई और आधुनिक कानून लागू हुए।
✦ निष्कर्ष
नागवंशी शासन व्यवस्था झारखंड की राजनीतिक-सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। इसमें राजा, मानकी, पड़हा पंचायत और भुईहर जैसे पद प्रशासनिक ढाँचे का हिस्सा थे। यह व्यवस्था प्रारंभ में सहयोग और सामूहिकता पर आधारित थी, लेकिन मुगलों और अंग्रेजों के हस्तक्षेप से कर वसूली और जमींदारी प्रथा जुड़ गई। अंततः अंग्रेजी कानूनों के लागू होने से नागवंशी शासन व्यवस्था समाप्त हो गई।