Munda janjati ka sashan Padaha Panchayat | मुंडा प्रशासन व्यवस्था : पड़हा पंचायत शासन प्रणाली

भारत की जनजातीय परंपराएँ केवल सांस्कृतिक धरोहर ही नहीं हैं, बल्कि वे प्रशासनिक और सामाजिक संगठन की अनूठी मिसाल भी प्रस्तुत करती हैं। झारखंड की मुंडा जनजाति ने अपने जीवन को संगठित करने के लिए जो पड़हा पंचायत व्यवस्था (Padaha Panchayat)  विकसित की, वह भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा का प्रारंभिक स्वरूप मानी जाती है। यह व्यवस्था न केवल सामाजिक और धार्मिक जीवन को नियंत्रित करती थी, बल्कि न्याय, शासन और सहयोग की भावना को भी जीवित रखती थी।

मुंडा जनजाति का परिचय

  • मुंडा जनजाति झारखंड की प्रमुख जनजातियों में से एक है।
  • इन्हें कोलेरियन समूह की सशक्त जनजाति माना जाता है।
  • प्रजातीय दृष्टि से इन्हें प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉयड समूह में रखा गया है।
  • इनके उद्गम को लेकर विद्वानों में मतभेद है:
    • कुछ विद्वान इन्हें तिब्बत से आए मानते हैं।
    • कुछ के अनुसार ये दक्षिण-पश्चिम भारत से आर्यों के दबाव में मध्यप्रदेश आए और बाद में झारखंड पहुँचे।
    • एक अन्य मत के अनुसार, ये दक्षिण-पूर्व भारत से आए और असुर जनजाति को पराजित कर झारखंड में बस गए।

 भाषा और सांस्कृतिक पहचान

  • मुंडा अपनी भाषा को मुंडारी कहते हैं, जो ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार की शाखा है।
  • वे अपनी भाषा को “होडो जगर” भी कहते हैं।
  • यह जनजाति मुख्यतः राँची, खूँटी, गुमला, सिमडेगा, हजारीबाग, गिरिडीह, सिंहभूम और संथाल परगना में पाई जाती है।
  • गाँव में तीन विशेष स्थल होते हैं:
    • सरना – ग्राम देवता का स्थान।
    • अखड़ा – पंचायत और सामूहिक नृत्य-गान का स्थल।
    • सासन – समाधि स्थल, जहाँ पत्थर के शील (सासनदिरी) रखे जाते हैं।
  • युवागृह को गीतिओड़ा कहा जाता है।

 खूँटकट्टी व्यवस्था : प्रशासनिक आधार

  • जब मुंडा झारखंड में आए, उन्होंने वनों को साफ कर कृषि शुरू की।
  • उनके बनाए खेत को खूँटकट्टी खेत और गाँव को खूँटकट्टी गाँव कहा गया।
  • खेत बनाने वाला खूँटकट्टीदार कहलाता था।
  • “खूँट” का अर्थ परिवार होता है।
  • इस व्यवस्था में प्रत्येक खूँट अपने जंगल और जमीन का मालिक होता था।
  • जनसंख्या बढ़ने पर नए गाँव बने, लेकिन उनकी सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था मूल गाँव से ही संचालित होती थी।
  • धीरे-धीरे कई गाँव मिलकर पड़हा बने।

 पड़हा पंचायत व्यवस्था

  1. ग्राम पंचायत

  • प्रत्येक गाँव की पंचायत होती थी।
  • इसका प्रमुख मुंडा कहलाता था।
  1. पट्टी

  • कई गाँव मिलकर एक पट्टी बनाते थे।
  • इसका प्रमुख मानकी होता था।
  1. पड़हा

  • कई पट्टियों को मिलाकर पड़हा बनता था।
  • इसका प्रमुख पड़हा राजा कहलाता था।
  • पड़हा में प्रायः एक ही कुल के सदस्य होते थे।
  1. पड़हा पंचायत

  • पड़हा की अपनी पंचायत होती थी।
  • इसमें पाँच कार्यपालक अधिकारी होते थे:
    • दीवान
    • ठाकुर
    • पांडे
    • कर्ता
    • लाल
  • ये पद वंशानुगत होते थे।
  • पड़हा राजा का चुनाव होता था, वह वंशानुगत नहीं होता था।
  • यही कारण है कि इसे भारत की प्रथम गणतांत्रिक व्यवस्था कहा जाता है।

 पड़हा पंचायत के कार्य

  • सीमा विवादों का निपटारा।
  • आपसी झगड़ों का समाधान।
  • सामाजिक और धार्मिक नियमों का पालन।
  • न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका – तीनों भूमिकाएँ निभाना।
  • राजा और अधिकारी मिलकर निर्णय लेते थे।
  • किसी भी प्रकार का राजस्व प्राप्त नहीं होता था, इसलिए इसे सहकारी व्यवस्था कहा जाता है।

पड़हा पंचायत का लोकतांत्रिक स्वरूप

  • पड़हा राजा का चुनाव होता था।
  • निर्णय सामूहिक होते थे।
  • राजस्व की व्यवस्था नहीं थी, सब कुछ सहयोग पर आधारित था।
  • यह व्यवस्था लोकतंत्र और सहकारिता की मिसाल थी।

पड़हा पंचायत का आधुनिक समय में परिवर्तन

  • वर्तमान में सरकारी पंचायतें स्थापित हो गई हैं।
  • ये पंचायतें सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप करती हैं।
  • पारंपरिक पंचायतें अब गौण होती जा रही हैं।
  • फिर भी सांस्कृतिक और धार्मिक मामलों में पड़हा पंचायत का महत्व बना हुआ है।

 पड़हा पंचायत का सामाजिक महत्व

  • यह व्यवस्था सामूहिकता और सहयोग की भावना को जीवित रखती थी।
  • गाँवों के बीच एकता बनाए रखती थी।
  • न्याय और शासन का स्थानीय स्वरूप प्रस्तुत करती थी।
  • यह जनजातीय लोकतंत्र का उत्कृष्ट उदाहरण है।

पड़हा पंचायत का तुलनात्मक विश्लेषण

  • पड़हा पंचायत को भारत की अन्य जनजातीय व्यवस्थाओं से तुलना की जा सकती है।
  • नागा जनजाति की मोरुंग व्यवस्था, गोंड जनजाति की परगना व्यवस्था, संथालों की माणिक पंचायत – सभी में सामूहिकता और लोकतांत्रिक तत्व मिलते हैं।
  • लेकिन मुंडा पड़हा पंचायत की विशेषता यह है कि इसमें राजा का चुनाव होता था और पद वंशानुगत नहीं था।

पड़हा पंचायत का चुनौतियाँ और भविष्य

  • आधुनिक पंचायत व्यवस्था के कारण पारंपरिक पंचायत कमजोर हो रही है।
  • युवा पीढ़ी आधुनिक शिक्षा और रोजगार की ओर बढ़ रही है।
  • फिर भी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के लिए पड़हा पंचायत का महत्व है।
  • इसे संरक्षित और पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।
 निष्कर्ष

मुंडा जनजाति की पड़हा पंचायत व्यवस्था भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है। यह व्यवस्था न केवल सामाजिक और धार्मिक जीवन को संगठित करती थी, बल्कि न्याय और शासन की मूलभूत आवश्यकताओं को भी पूरा करती थी। आधुनिक समय में भले ही यह व्यवस्था कमजोर हो रही हो, लेकिन इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

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