Swami vivekanand | स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद( Swami vivekanand) संसार के लिए एक ऐसी संस्कृति की कल्पना की जो पश्चिम देशों के भौतिकवाद एवं पूर्वी देशों के अध्यात्मवाद के मध्य संतुलन बनाने की बात कर सके तथा संपूर्ण विश्व को धर्म के क्षेत्र में एक नई पहचान प्रदान कर सकें। स्वामी विवेकानंद जी ने ऐसे धर्म को नकारा जो किसी विधा के आंसू नहीं पोछ सकता एवं किसी अनाथ को रोटी नहीं दे सकता। स्वामी विवेकानंद( Swami vivekanand)  ने एक ऐसे समाज सुधार के रूप में सामने आये  जिन्हों ने  ईश्वर प्राप्ति तथा मुक्ति के अनेक रास्ते बताये हैं।उस रास्ते से चलकर मानव समाज अपने जीवन को कृतज्ञ कर सकता है। उन्होंने धर्म को मानव समाज और राष्ट्र के निर्माण के लिए स्वीकार किया और कहा कि धर्म मनुष्य के लिए है; मनुष्य धर्म के लिए नहीं। मानव की सेवा ईश्वर की सेवा है क्योंकि मानव ईश्वर का ही रूप है। स्वामी विवेकानंद भारतीय अध्यापकों की  व्याख्या ही नहीं की बल्कि युवाओं को भी प्रेरित करने के लिए अनेक कदम उठाए। आधुनिक भारत के एक क्रांतिकारी विचारक जाने जाते हैं।

 स्वामी विवेकानंद( Swami vivekanand)           

जन्म :-12 जनवरी 1863

विवेकानंद

निधन:-4जुलाई 1902,

जन्म स्थान:- कलकत्ता

पिता:- विश्वनाथ दत्त

विवेकानंद का मूल नाम :-नरेन्द्र नाथ दत्त

विवेकानंद नाम दिया:-महाराजा खेतड़ी

स्थापना:-वेदांत सोसाइटी,1896 न्यूयॉर्क

पत्रिका का संपादन:- 1. प्रबुद्ध भारत(अंग्रेजी )

                                  2. उद्बोधन (बांग्ला)

प्रचारक:-रामकृष्ण मिशन ।

आध्यात्मिक पिता की संज्ञा दी  है:- नेता जी सुभाष चंद्रबोस

सम्मान में दिवस :- 12 जनवरी राष्ट्रीय युवा दिवस ।

स्वामी विवेकानंद ( Swami vivekanand) का मूल नाम नरेंद्र नाथ दत्त था।  बचपन से ही उनकी बुद्धि बहुत तेज थी और परमात्मा को पाने की लालसा प्रबल थी। वे बचपन से ही अध्यात्म की पुस्तकें पढ़ने में रुचि रखते थे। एक घटना है कि वह पुस्तकालय से प्रत्येक दिन पुस्तके लाते और अगले दिन पहुंचा देते हैं एक दिन विवेकानंद से पुस्तकालय के कर्मचारी ने पूछा तुम पुस्तक पढ़ने के लिए ले जाते हो या देखने के लिए इसके उत्तर में विवेकानंद ने बोले आप इस पुस्तक के किसी भी पृष्ठ में लिखी बातों को मैं बता सकता हूं कर्मचारी ने एक पृष्ठ खोला और उसका नंबर बता कर पूछा बताओ उस पर क्या लिखा है विवेकानंद ने बिना देखे पृष्ठ पृष्ठ पर लिखी बातें हु बहु सुना दिया। यह सुनकर पुस्तकालय के कर्मचारी हद प्रद रह गए।

विवेकानंद के पिता विश्वनाथ दत्त उन्हें वकील बनाना चाहते थे जो स्वयं कोलकाता उच्च न्यायालय में वकील थे , लेकिन बचपन से ही अध्यात्म से जुड़े विभिन्न धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने के कारण स्वामी विवेकानंद अध्यात्म की राह पर आगे चलते रह गए। अध्यात्म की इस लगाओ ने सन 1881 ईस्वी में रामकृष्ण आंदोलन के मुख्य प्रेरक स्वामी रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात हो गई और वह उनके शिष्य बन गए। रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार का श्रेय उनके योग्य शिष्य विवेकानंद को जाता है। विश्व में भारतीय अध्यात्म का प्रचार प्रसार करने का श्रेय सर्वप्रथम विवेकानंद को जाता है। जिन्होंने 31 मई 1883 ईस्वी को अमेरिका के शिकागो शहर गए जहां 11 सितंबर 1883 ईस्वी को आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में सबका दिल जीत लिया। अपने भाषण में भौतिकवाद एवं अध्यात्म के मध्य संतुलन बनाने की बात कही विवेकानंद ने पूरे संसार के लिए एक ऐसी संस्कृति की कल्पना की जो पश्चिम देशों के भौतिकवाद एवं पूर्वी देशों के अध्यात्मवाद के मध्य संतुलन बनाने की बात कर सके तथा संपूर्ण विश्व को खुशियां प्रदान कर सके। स्वामी विवेकानंद ने कहा हम मानवता को वहां ले जाना चाहते हैं जहां न वेद है ना बाइबल और ना कुरान । लेकिन यह काम वेद, बाइबल और कुरान के मध्य समन्वय स्थापित कर किया जा सकता है। शिकागो के धर्म संसद सम्मेलन में उन्होंने शून्य को ब्रह्मा सिद्ध किया और भारतीय धर्म दर्शन को अद्वैत वेदांत की श्रेष्ठता का लोहा मनवाया। उन्होंने कहा कि जब हम किसी व्यक्ति या वस्तु को उसकी आत्मा से पृथक कर प्रेम करते हैं तो फलता हमें कष्ट भोगना पड़ता है। आता हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि व्यक्ति को उसकी आत्मा से जोड़ कर देखें।

स्वामी विवेकानंद 4 वर्षों तक अमेरिका के विभिन्न शहरों में भारतीय अध्यात्म का प्रचार प्रसार किया। 1887 इसमें भारत लौटे यहां भारतीयों को आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान की। धार्मिक आडंबर , रुढियों, पुरोहित वाद कठमुल्लापन से लोगों को बचने की सलाह दी । अपनी विचार से उन्होंने लोगों और समाज को जगाने का काम किया। इतना ही नहीं वे अन्य देशों में भी अध्यात्म का प्रचार प्रसार किया इसके लिए उन्होंने अनेक देशों की यात्राएं की। 4 जुलाई उन्हें 1902 ईस्वी को स्वामी विवेकानंद ब्रह्म ब्रह्म में लीन हो गए। किंतु उनकी विचारधारा आज भी लोगों के मन में जिंदा है।

                                                                           आलेख:- डॉ आनंद  किशोर दांगी

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